महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रायशः कृपणानां हि तथाबन्धुमतामपि । विधवानां च वित्तानि हरिष्यन्तीह मानवाः ॥ ३० ॥ लोग प्रायः दीनों, असहायों तथा विधवाओंका भी धन हड़प लेंगे ॥ ३० ॥ स्वल्पवीर्यबलाः स्तब्धा लोभमोहपरायणाः । तत्कथादानसंतुष्टा दुष्टानमपि मानवाः ॥ ३१ ॥ परिग्रहं करिष्यन्ति मायाचारपरिग्रहाः । समाह्वयन्तः कौन्तेय राजानः पापबुद्धयः ॥ ३२ ॥ परस्परवधोद्युक्ता मूर्खाः पण्डितमानिनः । भविष्यन्ति युगस्यान्ते क्षत्रिया लोककण्टकाः ॥ ३३ ॥ उनके शारीरिक बल और पराक्रम क्षीण हो जायँगे। वे उद्दण्ड होकर लोभ और मोहमें डूबे रहेंगे। वैसे ही लोगोंकी चर्चा करने और उनसे दान लेनेमें प्रसन्नताका अनुभव करेंगे। कपटपूर्ण आचारको अपनाकर वे दुष्टोंके दिये हुए दानको भी ग्रहण कर लेंगे। कुन्तीनन्दन! पापबुद्धि राजा एक-दूसरेको युद्धके लिये ललकारते हुए परस्पर एक-दूसरेके प्राण लेनेको उतारू रहेंगे और मूर्ख होते हुए अपनेको पण्डित मानेंगे। इस प्रकार युगान्तकालके सभी क्षत्रिय जगत्के लिये काँटे बन जायँगे ॥ ३१—३३ ॥ अरक्षितारो लुब्धाश्च मानाहङ्कारदर्पिताः । केवलं दण्डरुचयो भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ३४ ॥ कलियुगकी समाप्तिके समय वे प्रजाकी रक्षा तो करेंगे नहीं, उनसे रुपये ऐंठनेके लिये लोभ अधिक रखेंगे। सदा मान और अहंकारके मदमें चूर रहेंगे। वे केवल प्रजाको दण्ड देनेके कार्यमें ही रुचि रखेंगे ॥ ३४ ॥ आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चापि धनानि च । भोक्ष्यन्ते निरनुक्रोशा रुदतामपि भारत ॥ ३५ ॥ भारत! लोग इतने निर्दयी हो जायँगे कि सज्जन पुरुषोंपर भी बार-बार आक्रमण करके उनके धन और स्त्रियोंका बलपूर्वक उपभोग करेंगे तथा उनके रोने-बिलखनेपर भी दया नहीं करेंगे ॥ ३५ ॥ न कन्यां याचते कश्चिन्नापि कन्या प्रदीयते । स्वयंग्राहा भविष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३६ ॥ कलियुगका अन्त आनेपर न तो कोई किसीसे कन्याकी याचना करेगा और न कोई कन्यादान ही करेगा। उस समयके वर-कन्या स्वयं ही एक-दूसरेको चुन लेंगे ॥ राजानश्चाप्यसंतुष्टाः परार्थान् मूढचेतसः । सर्वोपायैर्हरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ३७ ॥ कलियुगकी समाप्तिके समय असंतोषी तथा मूढ़चित्त राजा भी सब तरहके उपायोंसे दूसरोंके धनका अपहरण करेंगे ॥ ३७ ॥
म्लेच्छीभूतं जगत् सर्वं भविष्यति न संशयः । हस्तो हस्तं परिमुषेद् युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३८ ॥ उस समय सारा जगत् म्लेच्छ हो जायगा—इसमें संशय नहीं। एक हाथ दूसरे हाथको लूटेगा—सगा भाई भी भाईके धनको हड़प लेगा ॥ ३८ ॥
सत्यं संक्षिप्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः । स्थविरा बालमतयो बालाः स्थविरबुद्धयः ॥ ३९ ॥ अपनेको पण्डित माननेवाले मुनष्य संसारमें सत्यको मिटा देंगे। बूढ़ोंकी बुद्धि बालकों-जैसी होगी और बालकोंकी बूढ़ों-जैसी ॥ ३९ ॥
भीरुस्तथा शूरमानी शूरा भीरुविषादिनः । न विश्वसन्ति चान्योन्यं युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४० ॥ युगान्तकाल उपस्थित होनेपर कायर अपनेको शूर-वीर मानेंगे और शूर-वीर कायरोंकी भाँति विषादमें डूबे रहेंगे। कोई एक-दूसरेका विश्वास नहीं करेंगे ॥ ४० ॥
एकाहार्यं युगं सर्वं लोभमोहव्यवस्थितम् । अधर्मो वर्द्धते तत्र न तु धर्मः प्रवर्तते ॥ ४१ ॥ युगके सब लोग लोभ और मोहमें फँसकर भक्ष्याभक्ष्यका विचार किये बिना ही एक साथ सम्मिलित होकर भोजन करने लगेंगे। अधर्म बढ़ेगा और धर्म विदा हो जायगा ॥ ४१ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या न शिष्यन्ति जनाधिप । एकवर्णस्तदा लोको भविष्यति युगक्षये ॥ ४२ ॥ नरेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका नाम भी नहीं रह जायगा। युगान्तकालमें सारा विश्व एक वर्ण, एक जातिका हो जायगा ॥ ४२ ॥
न क्षंस्यति पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा । भार्याश्च पतिशुश्रूषां न करिष्यन्ति संक्षये ॥ ४३ ॥ युगक्षय-कालमें पिता पुत्रके अपराधको क्षमा नहीं करेंगे और पुत्र भी पिताकी बात नहीं सहेगा। स्त्रियाँ अपने पतियोंकी सेवा छोड़ देंगी ॥ ४३ ॥
ये यवान्ना जनपदा गोधूमान्नास्तथैव च । तान् देशान् संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४४ ॥ युगान्तकाल आनेपर (लोग) उन प्रदेशोंमें चले जायँगे जहाँ जौ और गेहूँ आदि अनाज अधिक पैदा होते हैं (चाहे वह देश निषिद्ध ही क्यों न हो) ॥ ४४ ॥
स्वैराचाराश्च पुरुषा योषितश्च विशाम्पते । अन्योन्यं न सहिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४५ ॥ महाराज! युगान्तकाल आनेपर पुरुष और स्त्रियाँ स्वेच्छाचारी होकर एक-दूसरेके कार्य और विचारको नहीं सहेंगे ॥ ४५ ॥
म्लेच्छभूतं जगत् सर्वं भविष्यति युधिष्ठिर । न श्राद्धैस्तर्पयिष्यन्ति दैवतानीह मानवाः ॥ ४६ ॥ युधिष्ठिर! उस समय सारा जगत् म्लेच्छ हो जायगा। मनुष्य श्राद्ध और यज्ञ-कर्मोंद्वारा पितरों और देवताओंको संतुष्ट नहीं करेंगे ॥ ४६ ॥
न कश्चित् कस्यचिच्छ्रोता न कश्चित् कस्यचिद् गुरुः । तमोग्रस्तस्तदा लोको भविष्यति जनाधिप ॥ ४७ ॥ राजन्! उस समय कोई किसीका उपदेश नहीं सुनेगा और न कोई किसीका गुरु ही होगा। सारा जगत् अज्ञानमय अन्धकारसे आच्छादित हो जायगा ॥ ४७ ॥
परमायुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश । ततः प्राणान् विमोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ४८ ॥ पञ्चमे वाथ षष्ठे वा वर्षे कन्या प्रसूयते । सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नरास्तदा ॥ ४९ ॥ उस समय युगान्तकाल उपस्थित होनेपर लोगोंकी आयु अधिक-से-अधिक सोलह वर्षकी होगी, उसके बाद वे प्राणत्याग कर देंगे। पाँचवें या छठे वर्षमें स्त्रियाँ बच्चे पैदा करने लगेंगी और सात-आठ वर्षके पुरुष संतानोत्पादनमें प्रवृत्त हो जायँगे ॥ ४८-४९ ॥
पत्यौ स्त्री तु तदा राजन् पुरुषो वा स्त्रियं प्रति । युगान्ते राजशार्दूल न तोषमुपयास्यति ॥ ५० ॥ नृपश्रेष्ठ! युगान्तकाल आनेपर स्त्री अपने पतिसे और पति अपनी स्त्रीसे संतुष्ट नहीं होंगे ॥ ५० ॥
अल्पद्रव्या वृथालिङ्गा हिंसा च प्रभविष्यति । न कश्चित् कस्यचिद् दाता भविष्यति युगक्षये ॥ ५१ ॥ कलियुगके अन्तभागमें लोगोंके पास धन थोड़ा रहेगा और लोग दिखावेके लिये साधुवेष धारण करेंगे। हिंसाका जोर बढ़ेगा और कोई किसीको कुछ देनेवाला नहीं रहेगा ॥ ५१ ॥
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः । केशशूलाः स्त्रियश्चापि भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ५२ ॥ युगक्षयकालमें सभी देशोंके लोग अन्न बेचेंगे। ब्राह्मण वेदविक्रय करेंगे और स्त्रियाँ वेश्या वृत्ति अपना लेंगी ॥ ५२ ॥
म्लेच्छाचाराः सर्वभक्षा दारुणाः सर्वकर्मसु । भाविनः पश्चिमे काले मनुष्या नात्र संशयः ॥ ५३ ॥ युगान्तकालके मनुष्य म्लेच्छों-जैसे आचारवाले और सर्वभक्षी यानी अभक्ष्यका भी भक्षण करनेवाले हो जायँगे। वे प्रत्येक कर्ममें अपनी क्रूरताका परिचय देंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३ ॥
क्रयविक्रयकाले च सर्वः सर्वस्य वञ्चनम् ।
युगान्ते भरतश्रेष्ठ वित्तलोभात् करिष्यति ॥ ५४ ॥
भरतश्रेष्ठ! युगान्तकालमें धनके लोभसे क्रय-विक्रयके समय सभी सबको ठगेंगे ॥ ५४ ॥
ज्ञानानि चाप्यविज्ञाय करिष्यन्ति क्रियास्तथा ।
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते युगान्ते समुपस्थिते ॥ ५५ ॥
क्रियाके तत्त्वको न जानकर भी लोग उसे करनेमें प्रवृत्त होंगे। युगान्तकालके सभी मानव स्वेच्छाचारी हो जायेंगे ॥ ५५ ॥
स्वभावात् क्रूरकर्माणश्चान्योन्यमभिशंसिनः ।
भवितारो जनाः सर्वे सम्प्राप्ते तु युगक्षये ॥ ५६ ॥
आरामांश्चैव वृक्षांश्च नाशयिष्यन्ति निर्व्यथाः ।
भविता संशयो लोके जीवितस्य हि देहिनाम् ॥ ५७ ॥
सभी स्वभावतः क्रूर और एक-दूसरेपर मिथ्या कलंक लगानेवाले होंगे। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर सब लोग बगीचों और वृक्षोंको कटवा देंगे और ऐसा करते समय उनके मनमें पीड़ा नहीं होगी। प्रत्येक मनुष्यके जीवनधारणमें भी शंका हो जायगी। अर्थात् प्रत्येक मनुष्यका जीवन धारण करना कठिन हो जायगा ॥ ५६-५७ ॥
तथा लोभाभिभूताश्च भविष्यन्ति नरा नृप ।
ब्राह्मणांश्च हनिष्यन्ति ब्राह्मणस्वोपभोगिनः ॥ ५८ ॥
राजन्! सब लोग लोभके वशीभूत होंगे और ब्राह्मणोंका धन उपभोग करनेका जिनका स्वभाव पड़ गया है, वे धनके लिये ब्राह्मणोंको मार भी डालेंगे ॥
हाहाकृता द्विजाश्चैव भयार्ता वृषलार्दिताः ।
त्रातारमलभन्तो वै भ्रमिष्यन्ति महीमिमाम् ॥ ५९ ॥
शूद्रोंके सताये हुए ब्राह्मण भयसे पीड़ित हो हाहाकार करने लगेंगे और अपने लिये कोई रक्षक न मिलनेके कारण सारी पृथ्वीपर निश्चय ही भटकते फिरेंगे ॥ ५९ ॥
जीवितान्तकराः क्रूरा रौद्राः प्राणिविहिंसकाः ।
यदा भविष्यन्ति नरास्तदा संक्षेप्स्यते युगम् ॥ ६० ॥
जब दूसरोंके जीवनका विनाश करनेवाले क्रूर, भयंकर तथा जीवहिंसक मनुष्य पैदा होने लगें, तब समझ लेना चाहिये कि युगान्तकाल उपस्थित हो गया ॥
आश्रयिष्यन्ति च नदीः पर्वतान् विषमाणि च ।
प्रधावमाना वित्रस्ता द्विजाः कुरुकुलोद्वह ॥ ६१ ॥
कुरुकुलतिलक युधिष्ठिर! अत्याचारियोंसे डरे हुए ब्राह्मण इधर-उधर भागकर नदियों, पर्वतों तथा दुर्गम स्थानोंका आश्रय लेंगे ॥ ६१ ॥
दस्युभिः पीडिता राजन् काका इव द्विजोत्तमाः ।
कुराजभिश्च सततं करभारप्रपीडिताः ।। ६२ ।।
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसंक्षये ।
विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारकाः ।। ६३ ।।
राजन्! श्रेष्ठ ब्राह्मण भी लुटेरोंसे पीड़ित होकर कौओंकी तरह काँव-काँव करते फिरेंगे। दुष्ट राजाओंके लगाये हुए करोंके भारसे सदा पीड़ित होनेके कारण वे धैर्य छोड़कर चल देंगे और शूद्रोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहकर धर्मविरुद्ध कार्य करेंगे। भूपाल! भयंकर कलियुगके अन्तमें जगत्की यही दशा होगी ।। ६२-६३ ।।
शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति ब्राह्मणाः पर्युपासकाः ।
श्रोतारश्च भविष्यन्ति प्रामाण्येन व्यवस्थिताः ।। ६४ ।।
विपरीतश्च लोकोऽयं भविष्यत्यधरोत्तरः ।
एडूकान् पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः ।। ६५ ।।
शूद्र धर्मोपदेश करेंगे और ब्राह्मणलोग उनकी सेवामें रहकर उसे सुनेंगे तथा उसीको प्रामाणिक मानकर उसका पालन करेंगे। समस्त लोकका व्यवहार विपरीत और उलट-पुलट हो जायगा। ऊँच नीच और नीच ऊँच हो जायेंगे। लोग हड्डी जड़ी हुई दीवारोंकी तो पूजा करेंगे और देवविग्रहोंको त्याग देंगे ।। ६४-६५ ।।
शूद्राः परिचरिष्यन्ति न द्विजान् युगसंक्षये ।
आश्रमेषु महर्षीणां ब्राह्मणावसथेषु च ।। ६६ ।।
देवस्थानेषु चैत्येषु नागानामालयेषु च ।
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता ।। ६७ ।।
युगान्तकालमें शूद्र द्विजातियोंकी सेवा नहीं करेंगे। वह समय आनेपर महर्षियोंके आश्रमोंमें, ब्राह्मणोंके घरोंमें, देवस्थानोंमें, चैत्यवृक्षोंके आस-पास और नागलयोंमें जो भूमि होगी, उसपर हड्डी जड़ी हुई दीवारोंका चिह्न तो उपलब्ध होगा; परंतु देवमन्दिर उस भूमिकी शोभा नहीं बढ़ायेंगे ।। ६६-६७ ।।
भविष्यति युगे क्षीणे तद् युगान्तस्य लक्षणम् ।
यदा रौद्रा धर्महीना मांसादाः पानपास्तथा ।। ६८ ।।
भविष्यन्ति नरा नित्यं तदा संक्षेप्स्यते युगम् ।
यह सब युगान्तका लक्षण समझना चाहिये। जब सब मानव सदा भयंकर स्वभाववाले, धर्महीन, मांसखोर और शराबी हो जायेंगे, उस समय युगका संहार होगा ।।
पुष्पं पुष्पे यदा राजन् फले वा फलमाश्रितम् ।। ६९ ।।
प्रजास्यति महाराज तदा संक्षेप्स्यते युगम् ।
अकालवर्षी पर्जन्यो भविष्यति गते युगे ।। ७० ।।
महाराज! जब फूलमें फूल, फलमें फल लगने लगेगा, उस समय युगका संहार होगा। युगान्तकालमें मेघ असमयमें ही वर्षा करेंगे ।। ६९-७० ।।
अक्रमेण मनुष्याणां भविष्यन्ति तदा क्रियाः ।
विरोधमथ यास्यन्ति वृषला ब्राह्मणैः सह ॥ ७१ ॥
मनुष्योंकी सारी क्रियाएँ क्रमसे विपरीत होंगी। शूद्र ब्राह्मणोंके साथ विरोध करेंगे ॥ ७१ ॥
मही म्लेच्छजनाकीर्णा भविष्यति ततोऽचिरात् ।
करभारभयाद् विप्रा भजिष्यन्ति दिशो दश ॥ ७२ ॥
सारी पृथ्वी थोड़े ही समयमें म्लेच्छोंसे भर जायगी। ब्राह्मणलोग करोंके भारसे भयभीत होकर दसों दिशाओंकी शरण लेंगे ॥ ७२ ॥
निर्विशेषा जनपदास्तथा विष्टिकरादिताः ।
आश्रमानुपलप्स्यन्ति फलमूलोपजीविनः ॥ ७३ ॥
सारे जनपद एक-जैसे आचार और वेशभूषा बना लेंगे। लोग बेगार लेनेवालों और कर लेनेवालोंसे पीड़ित हो एकान्त आश्रमोंमें चले जायँगे और फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करेंगे ॥ ७३ ॥
एवं पर्याकुले लोके मर्यादा न भविष्यति ।
न स्थास्यन्त्युपदेशे च शिष्या विप्रियकारिणः ॥ ७४ ॥
इस तरह उथल-पुथल मच जानेपर संसारमें कोई मर्यादा नहीं रह जायगी। शिष्य गुरुके उपदेशपर नहीं चलेंगे। वे उलटे उनका अहित करेंगे ॥ ७४ ॥
आचार्योऽपनिधिश्चैव भर्त्स्यते तदनन्तरम् ।
अर्थयुक्त्या प्रवत्स्यन्ति मित्रसम्बन्धिबान्धवाः ॥ ७५ ॥
अपने कुलका आचार्य भी यदि निर्धन हो तो उसे निरन्तर शिष्योंकी डाँट-फटकार सुननी पड़ेगी। मित्र, सम्बन्धी या भाई-बन्धु धनके लालचसे ही अपने पास रहेंगे ॥
अभावः सर्वभूतानां युगान्ते सम्भविष्यति ।
दिशः प्रज्वलिताः सर्वा नक्षत्राण्यप्रभाणि च ॥ ७६ ॥
युगान्तकाल आनेपर समस्त प्राणियोंका अभाव हो जायगा। सारी दिशाएँ प्रज्वलित हो उठेंगी और नक्षत्रोंकी प्रभा विलुप्त हो जायगी ॥ ७६ ॥
ज्योतींषि प्रतिकूलानि वाताः पर्याकुलास्तथा ।
उल्कापाताश्च बहवो महाभयनिदर्शकाः ॥ ७७ ॥
ग्रह उलटी गतिसे चलने लगेंगे। हवा इतनी जोरसे चलेगी कि लोग व्याकुल हो उठेंगे। महान् भयकी सूचना देनेवाले उल्कापात बार-बार होते रहेंगे ॥ ७७ ॥
षड्भिरन्यैश्च सहितो भास्करः प्रतपिष्यति ।
तुमुलाश्चापि निर्ह्रादा दिग्दाहाश्चापि सर्वशः ॥ ७८ ॥
एक सूर्य तो है ही, छः और उदय होंगे और सातों एक साथ तपेंगे। सब ओर बिजलीकी भयानक गड़गड़ाहट होगी, सब दिशाओंमें आग लगेगी ॥ ७८ ॥
कबन्धान्तर्हितो भानुरुदयास्तमने तदा ।
अकालवर्षी भगवान् भविष्यति सहस्रदृक् ॥ ७९ ॥
उदय और अस्तके समय सूर्य राहुसे ग्रस्त दिखायी देगा। भगवान् इन्द्र समयपर वर्षा नहीं करेंगे ॥
सस्यानि च न रोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ।
अभीक्ष्णं क्रूरवादिन्यः परुषा रुदितप्रियाः ॥ ८० ॥
युगान्तकाल उपस्थित होनेपर बोयी हुई खेती उगेगी ही नहीं; स्त्रियाँ कठोर स्वभाववाली और सदा कटुवादिनी होंगी। उन्हें रोना ही अधिक पसंद होगा ॥ ८० ॥
भर्तॄणां वचने चैव न स्थास्यन्ति ततः स्त्रियः ।
पुत्राश्च मातापितरौ हनिष्यन्ति युगक्षये ॥ ८१ ॥
वे पतिकी आज्ञामें नहीं रहेंगी। युगान्तकालमें पुत्र माता-पिताकी हत्या करेंगे ॥ ८१ ॥
सूदयिष्यन्ति च पतीन् स्त्रियः पुत्रानपाश्रिताः ।
अपर्वणि महाराज सूर्यं राहुरुपैष्यति ॥ ८२ ॥
नारियाँ अपने बेटोंसे मिलकर पतिकी हत्या करा देंगी। महाराज! अमावस्याके बिना ही राहु सूर्यपर ग्रहण लगायेगा ॥ ८२ ॥
युगान्ते हुतभुक् चापि सर्वतः प्रज्वलिष्यति ।
पानीयं भोजनं चापि याचमानास्तदाध्वगाः ॥ ८३ ॥
न लप्स्यन्ते निवासं च निरस्ताः पथि शेरते ।
युगान्तकाल आनेपर सब ओर आग भी जल उठेगी। उस समय पथिकोंको माँगनेपर कहीं अन्न, जल या ठहरनेके लिये स्थान नहीं मिलेगा। वे सब ओरसे कोरा जवाब पाकर निराश हो सड़कोंपर ही सो रहेंगे ॥
निर्घातवायसा नागाः शकुनाः समृगद्विजाः ॥ ८४ ॥
रूक्षा वाचो विमोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ।
मित्रसम्बन्धिनश्चापि संत्यक्ष्यन्ति नरास्तदा ॥ ८५ ॥
जनं परिजनं चापि युगान्ते पर्युपस्थिते ।
युगान्तकाल उपस्थित होनेपर बिजलीकी कड़कके समान कड़वी बोली बोलनेवाले कौवे, हाथी, शकुन, पशु और पक्षी आदि बड़ी कठोर वाणी बोलेंगे। उस समयके मनुष्य अपने मित्रों, सम्बन्धियों, सेवकों तथा कुटुम्बीजनोंको भी अकारण त्याग देंगे ॥ ८४-८५½ ॥
अथ देशान् दिशश्चापि पत्तनानि पुराणि च ॥ ८६ ॥
क्रमशः संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ।
हा तात हा सुतेत्येवं तदा वाचः सुदारुणाः ॥ ८७ ॥
विक्रोशमानश्चान्योन्यं जनो गां पर्यटिष्यति ।
ततस्तुमुलसङ्घाते वर्तमाने युगक्षये ॥ ८८ ॥ प्रायः लोग स्वदेश छोड़कर दूसरे देशों, दिशाओं, नगरों और गाँवोंका आश्रय लेंगे और हा तात! हा पुत्र! इत्यादि रूपसे अत्यन्त दुःखद वाणीमें एक-दूसरेको पुकारते हुए इस पृथ्वीपर विचरेंगे। युगान्तकालमें संसारकी यही दशा होगी। उस समय एक ही साथ समस्त लोकोंका भयंकर संहार होगा ॥ ८६–८८ ॥
द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति । ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पुनर्लोकविवृद्धये ॥ ८९ ॥ भविष्यति पुनर्दैवमनुकूलं यदृच्छया । यदा सूर्यश्च चन्द्रश्च तथा तिष्यबृहस्पती ॥ ९० ॥ एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् । कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च ॥ ९१ ॥ तदनन्तर कालान्तरमें सत्ययुगका आरम्भ होगा और फिर क्रमशः ब्राह्मण आदि वर्ण प्रकट होकर अपने प्रभावका विस्तार करेंगे। उस समय लोकके अभ्युदयके लिये पुनः अनायास दैव अनुकूल होगा। जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति एक साथ पुष्य नक्षत्र एवं तदनुरूप एक राशि कर्कमें पदार्पण करेंगे, तब सत्ययुगका प्रारम्भ होगा। उस समय मेघ समयपर वर्षा करेगा। नक्षत्र शुभ एवं तेजस्वी हो जायँगे ॥ ८९—९१ ॥
प्रदक्षिणा ग्रहाश्चापि भविष्यन्त्यनुलोमगाः । क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम् ॥ ९२ ॥ ग्रह प्रदक्षिणाभावसे अनुकूल गतिका आश्रय ले अपने पथपर अग्रसर होंगे। उस समय सबका मंगल होगा। देशमें सुकाल आ जायगा। आरोग्यका विस्तार होगा। तथा रोग-व्याधिका नाम भी नहीं रहेगा ॥ ९२ ॥
कल्की विष्णुयशा नाम द्विजः कालप्रचोदितः । उत्पत्स्यते महावीर्यो महाबुद्धिपराक्रमः ॥ ९३ ॥ सम्भूतः सम्भलग्रामे ब्राह्मणावसथे शुभे । (महात्मा वृत्तसम्पन्नः प्रजानां हितकृन्नृप ।) राजन्! युगान्तके समय कालकी प्रेरणासे सम्भल नामक ग्राममें किसी ब्राह्मणके मंगलमय गृहमें एक महान् शक्तिशाली बालक प्रकट होगा, जिसका नाम होगा विष्णुयशा कल्की। वह महान् बुद्धि एवं पराक्रमसे सम्पन्न महात्मा, सदाचारी तथा प्रजावर्गका हितैषी होगा। (वह बालक ही भगवान्का कल्की अवतार कहलायेगा) ॥ ९३ ॥
मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्यायुधानि च ॥ ९४ ॥ उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च । स धर्मविजयी राजा चक्रवर्ती भविष्यति ॥ ९५ ॥
मनके द्वारा चिन्तन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जायँगे। वह धर्मविजयी चक्रवर्ती राजा होगा ॥ ९४-९५ ॥ स चेमं संकुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति । उत्थितो ब्राह्मणो दीप्तः क्षयान्तकृदुदारधीः ॥ ९६ ॥ वह उदारबुद्धि, तेजस्वी ब्राह्मण, दुःखसे व्याप्त हुए इस जगत्को आनन्द प्रदान करेगा। कलियुगका अन्त करनेके लिये ही उसका प्रादुर्भाव होगा ॥ ९६ ॥ संक्षेपको हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तकः । स सर्वत्र गतान् क्षुद्रान् ब्राह्मणैः परिवारितः । उत्सादयिष्यति तदा सर्वम्लेच्छगणान् द्विजः ॥ ९७ ॥ वही सम्पूर्ण कलियुगका संहार करके नूतन सत्ययुगका प्रवर्तक होगा। वह ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ सर्वत्र विचरेगा और भूमण्डलमें सर्वत्र फैले हुए नीच स्वभाववाले सम्पूर्ण म्लेच्छोंका संहार कर डालेगा ॥ ९७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि भविष्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें भविष्यवर्णनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३/२ श्लोक मिलाकर कुल ९७ ३/२ श्लोक हैं)
१९१-
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश
मार्कण्डेय उवाच
ततश्चोरक्षयं कृत्वा द्विजेभ्यः पृथिवीमिमाम् ।
वाजिमेधे महायज्ञे विधिवत् कल्पयिष्यति ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! उस समय चोर-डाकुओं एवं म्लेच्छोंका विनाश करके भगवान् कल्की अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे और उसमें यह सारी पृथ्वी विधिपूर्वक ब्राह्मणको दे डालेंगे ॥ १ ॥
स्थापयित्वा च मर्यादाः स्वयम्भुविहिताः शुभाः ।
वनं पुण्ययशःकर्मा रमणीयं प्रवेक्ष्यति ॥ २ ॥
उनका यश तथा कर्म सभी परम पावन होंगे। वे ब्रह्माजीकी चलायी हुई मंगलमयी मर्यादाओंकी स्थापना करके (तपस्याके लिये) रमणीय वनमें प्रवेश करेंगे ॥ २ ॥
तच्छीलमनुवर्त्स्यन्ति मनुष्या लोकवासिनः ।
विप्रैश्चोरक्षये चैव कृते क्षेमं भविष्यति ॥ ३ ॥
फिर इस जगत्के निवासी मनुष्य उनके शील-स्वभावका अनुकरण करेंगे। इस प्रकार सत्ययुगमें ब्राह्मणोंद्वारा दस्युदलका विनाश हो जानेपर संसारका मंगल होगा ॥ ३ ॥
कृष्णाजिनानि शक्तींश्च त्रिशूलान्यायुधानि च ।
स्थापयन् द्विजशार्दूलो देशेषु विजितेषु च ॥ ४ ॥
संस्तूयमानो विप्रेन्द्रैर्मानयानो द्विजोत्तमान् ।
कल्की चरिष्यति महीं सदा दस्युवधे रतः ॥ ५ ॥
द्विजश्रेष्ठ कल्की सदा दस्युवधमें तत्पर रहकर समस्त भूतलपर विचरते रहेंगे और अपने द्वारा जीते हुए देशोंमें काले मृगचर्म, शक्ति, त्रिशूल तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंकी स्थापना करते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा अपनी स्तुति सुनेंगे और स्वयं भी उन ब्राह्मणशिरोमणियोंको यथोचित सम्मान देंगे ॥ ४-५ ॥
हा मातस्तात पुत्रेति तास्ता वाचः सुदारुणाः ।
विक्रोशमानान् सुभृशं दस्यून् नेष्यति संक्षयम् ॥ ६ ॥
ततोऽधर्मविनाशो वै धर्मवृद्धिश्च भारत ।
भविष्यति कृते प्राप्ते क्रियावांश्च जनस्तथा ॥ ७ ॥
उस समय चोर और लुटेरे दर्दभरी वाणीमें ‘हाय मैया’, ‘हाय बप्पा’ और ‘हाय बेटा’ इत्यादि कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करेंगे और उन सबका भगवान् कल्की विनाश कर डालेंगे। भारत! दस्युओंके नष्ट हो जानेपर अधर्मका भी नाश हो जायगा और धर्मकी वृद्धि होने लगेगी। इस प्रकार सत्ययुग आ जानेपर सब मनुष्य सत्यकर्मपरायण होंगे।। ६-७।।
आरामाश्चैव चैत्याश्च तटाकावसथास्तथा। पुष्करिण्यश्च विविधा देवतायतनानि च।। ८।। यज्ञक्रियाश्च विविधा भविष्यन्ति कृते युगे। ब्राह्मणाः साधवश्चैव मुनयश्च तपस्विनः।। ९।। उस युगमें नये-नये बगीचे लगाये जायँगे। चैत्यवृक्षोंकी स्थापना होगी। पोखरों और धर्मशालाओंका निर्माण होगा। भाँति-भाँतिकी पोखरियाँ तैयार होंगी। कितने ही देवमन्दिर बनेंगे और नाना प्रकारके यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान होगा। ब्राह्मण साधु-स्वभावके होंगे। मुनिलोग तपस्यामें तत्पर रहेंगे।। ८-९।।
आश्रमा हतपाखण्डाः स्थिताः सत्यरताः प्रजाः। जनिष्यन्ते च बीजानि रोप्यमाणानि चैव ह।। १०।। आश्रम पाखण्डियोंसे रहित होंगे और सारी प्रजा सत्यपरायण होगी। खेतोंमें बोये जानेवाले सब प्रकारके बीज अच्छी तरह उगेंगे।। १०।।
सर्वेष्वृतुषु राजेन्द्र सर्वं सस्यं भविष्यति। नरा दानेषु निरता व्रतेषु नियमेषु च।। ११।। राजेन्द्र! सभी ऋतुओंमें सभी प्रकारके अनाज पैदा होंगे। सब लोग दान, व्रत और नियमोंमें लगे रहेंगे।। ११।।
जपयज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युताः। पालयिष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुन्धराम्।। १२।। ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक जपयज्ञमें तत्पर रहेंगे और धर्ममें ही उनकी रुचि होगी। क्षत्रियनरेश धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करेंगे।। १२।।
व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे। षट्कर्मनिरता विप्राः क्षत्रिया विक्रमे रताः।। १३।। शुश्रूषायां रताः शूद्रास्तथा वर्णत्रयस्य च। सत्ययुगके वैश्य सदा न्यायपूर्वक व्यापार करनेवाले होंगे। ब्राह्मण यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें तत्पर रहेंगे। क्षत्रिय बल-पराक्रममें अनुराग रखेंगे तथा शूद्र ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवामें लगे रहेंगे।। १३ १/२।।
एष धर्मः कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा।। १४।। पश्चिमे युगकाले च यः स ते सम्प्रकीर्तितः। सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव।। १५।।
धर्मका यह स्वरूप सत्ययुगमें अक्षुण्ण रहेगा। त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें धर्मकी जैसी स्थिति रहेगी, उसका वर्णन तुमसे किया जा चुका है। पाण्डुनन्दन! तुम्हें सम्पूर्ण लोककी युग-संख्याका ज्ञान भी हो चुका है॥ १४-१५॥
एतत् ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं तथा।
वायुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम्॥ १६॥
राजन्! ऋषियोंद्वारा प्रशंसित तथा वायुदेवद्वारा वर्णित पुराणकी बातोंका स्मरण करके मैंने तुमसे यह भूत-भविष्यका सारा वृत्तान्त बताया है॥ १६॥
एवं संसारमार्गा मे बहुशश्चिरजीविना।
दृष्टाश्चैवानुभूताश्च तांस्ते कथितवानहम्॥ १७॥
इस प्रकार चिरजीवी होनेके कारण मैंने संसारके मार्गोंका अनेक बार दर्शन और अनुभव किया है, जिनका तुम्हारे समक्ष वर्णन कर दिया है॥ १७॥
इदं चैवापरं भूयः सह भ्रातृभिरच्युत।
धर्मसंशयमोक्षार्थं निबोध वचनं मम॥ १८॥
धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंसहित यह मेरी एक बात और सुनो। धर्मविषयक संदेहका निवारण करनेके लिये मेरे वचनको ध्यान देकर सुनो॥ १८॥
धर्मे त्वयाऽऽत्मा संयोज्यो नित्यं धर्मभृतां वर।
धर्मात्मा हि सुखं राजन् प्रेत्य चेह च नन्दति॥ १९॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने-आपको सदा धर्ममें ही लगाये रखना चाहिये; क्योंकि धर्मात्मा मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी बड़े सुखसे रहता है॥ १९॥
निबोध च शुभां वाणीं यां प्रवक्ष्यामि तेऽनघ।
न ब्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन॥ २०॥
ब्राह्मणः कुपितो हन्यादपि लोकान् प्रतिज्ञया।
निष्पाप नरेश! मेरी इस कल्याणमयी वाणीको समझो, जिसे मैं अभी तुम्हें सुना रहा हूँ। युधिष्ठिर! तुम्हें कभी किसी ब्राह्मणका तिरस्कार नहीं करना चाहिये; क्योंकि यदि ब्राह्मण कुपित हो जाय और किसी बातकी प्रतिज्ञा कर ले, तो वह उस प्रतिज्ञाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर सकता है॥ २० १/२॥
वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृपः॥ २१॥
उवाच वचनं धीमान् परं परमद्युतिः।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मार्कण्डेयजीकी यह बात सुनकर परम तेजस्वी और बुद्धिमान् कुरुकुलरत्न राजा युधिष्ठिरने यह उत्तम वचन कहा—॥ २१ १/२॥
कस्मिन् धर्मे मया स्थेयं प्रजाः संरक्षता मुने ॥ २२ ॥ कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मतः । ‘मुने! प्रजाकी रक्षा करते हुए किस धर्ममें स्थित रहना चाहिये। मेरा व्यवहार और बर्ताव कैसा हो, जिससे मैं स्वधर्मसे कभी च्युत न होऊँ?’ ॥ २२ ½ ॥
मार्कण्डेय उवाच
दयावान् सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयकः ॥ २३ ॥ सत्यवादी मृदुर्दान्तः प्रजानां रक्षणे रतः । चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन् देवांश्च पूजय ॥ २४ ॥ मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तुम सब प्राणियोंपर दया करो। सबके हितैषी बने रहो। सबपर प्रेमभाव रखो और किसीमें दोषद्दष्टि मत करो। सत्यवादी, कोमलस्वभाव, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर रहकर धर्मका आचरण करो। अधर्मको दूरसे ही त्याग दो तथा देवता और पितरोंकी आराधना करते रहो ॥ २३-२४ ॥
प्रमादाद् यत् कृतं तेऽभूत् सम्यग् दानेन तज्जय । अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान् भव ॥ २५ ॥ यदि प्रमादवश तुम्हारेद्वारा किसीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार हो गया हो तो उसे अच्छी प्रकार दानसे संतुष्ट करके वशमें करो। मैं सबका स्वामी हूँ, ऐसे अहंकारको कभी पासमें न आने दो। तुम अपनेको सदा पराधीन समझते रहो ॥ २५ ॥
विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव । एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः ॥ २६ ॥ न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदतीतानागतं भुवि । तस्मादिमं परिक्लेशं त्वं तात हृदि मा कृथाः ॥ २७ ॥ सारी पृथ्विको जीतकर सदा सानन्द और सुखी रहो। तात युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें जो यह धर्म बताया है, इसका पालन भूतकालमें भी हुआ है और भविष्यकालमें भी इसका पालन होना चाहिए। भूत और भविष्यकी ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; अतः इस समय जो यह क्लेश तुम्हें प्राप्त हुआ है, इसके लिये हृदयमें कोई विचार न करो ॥ २६-२७ ॥
प्राज्ञास्तात न मुह्यन्ति कालेनापि प्रपीडिताः । एष कालो महाबाहो अपि सर्वदिवौकसाम् ॥ २८ ॥ तात! विद्वान् पुरुष कालसे पीड़ित होनेपर भी कभी मोहमें नहीं पड़ते। महाबाहो! यह काल सम्पूर्ण देवताओंपर भी अपना प्रभाव डालता है ॥ २८ ॥
मुह्यन्ति हि प्रजास्तात कालेनापि प्रचोदिताः । मा च तत्र विशङ्काभूद् यन्मयोक्तं तवानघ ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर! कालसे प्रेरित होकर ही यह सारी प्रजा मोहग्रस्त होती है। अनघ! मैंने तुम्हारे सामने जो कुछ भी कहा है, उसमें तुम्हें किसी प्रकारकी शंका नहीं होनी चाहिये ॥ २९ ॥
आशङ्क्य मद्वचो ह्येतद् धर्मलोपो भवेत् तव ।
जातोऽसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ ॥ ३० ॥
कर्मणा मनसा वाचा सर्वमेतत् समाचर ।
मेरे इस वचनमें संदेह करनेपर तुम्हारे धर्मका लोप होगा। भरतकुलभूषण। तुम कौरवोंके प्रख्यात कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन सब बातोंका पालन करो ॥ ३० १/२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यत् त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् ॥ ३१ ॥
तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासनं विभो ।
न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सरः ॥ ३२ ॥
करिष्यामि हि तत् सर्वमुक्तं यत् ते मयि प्रभो ।
युधिष्ठिरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानोंको मधुर एवं मनको प्रिय लगा है। विभो! मैं आपकी आज्ञाका यत्नपूर्वक पालन करूँगा। ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे मनमें लोभ, भय और ईर्ष्या नहीं है। प्रभो! आपने मेरे लिये जो कहा है, इसका अवश्य पालन करूँगा ॥ ३१-३२ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः ॥ ३३ ॥
संहृष्टाः पाण्डवा राजन् सहिताः शार्ङ्गधन्वना ।
विप्रर्षभाश्च ते सर्वे ये तत्रासन् समागताः ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! उन परम बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णसहित पाँचों पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। साथ ही जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३३-३४ ॥
तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः ।
विस्मिताः समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात् ॥ ३५ ॥
बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीके मुखसे वह मंगलमयी कथा सुनकर पुराणोक्त बातोंका ज्ञान हो जानेसे सब लोग बड़े ही विस्मित और प्रसन्न हुए ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि युधिष्ठिरानुशासने
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें युधिष्ठिरके लिये उपदेशविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९१ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयसे कहा—'ब्रह्मन्! पुनः ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन कीजिये' ॥ १ ॥
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित्का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता
वैशम्पायन उवाच
भूय एव ब्राह्मणमहाभाग्यं वक्तुमर्हसीत्यब्रवीत् पाण्डवेयो मार्कण्डेयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयसे कहा—'ब्रह्मन्! पुनः ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन कीजिये' ॥ १ ॥
अथाचष्ट मार्कण्डेयोऽपूर्वमिदं श्रूयतां ब्राह्मणानां चरितम् ॥ २ ॥
तब मार्कण्डेयजीने कहा—'राजन्! ब्राह्मणोंके इस अद्भुत चरित्रका श्रवण करो ॥ २ ॥
‘अयोध्यायामिक्ष्वाकुकुलोद्वहः पार्थिवः परिक्षिन्नाम मृगयामगमत् ॥ ३ ॥
'अयोध्यापुरीमें इक्ष्वाकुकुलके धुरंधर वीर राजा परीक्षित् रहते थे। वे एक दिन शिकार खेलनेके लिये गये ॥ ३ ॥
तमेकाश्वेन मृगमनुसरन्तं मृगो दूरमपाहरत् ॥ ४ ॥
'उन्होंने एकमात्र अश्वकी सहायतासे एक हिंसक पशुका पीछा किया। वह पशु उन्हें बहुत दूर हटा ले गया ॥ ४ ॥
अध्वनि जातश्रमः क्षुत्तृष्णाभिभूतश्चैकस्मिन् देशे नीलं गहनं वनखण्डमपश्यत् ॥ ५ ॥
'मार्गमें उन्हें बड़ी थकावट हुई और वे भूख-प्याससे व्याकुल हो गये। उसी समय उन्हें एक ओर नीले रंगका एक दूसरा वन दिखायी दिया, जो और भी घना था ॥ ५ ॥
तच्च विवेश ततस्तस्य वनखण्डस्य मध्येऽतीव रमणीयं सरो दृष्ट्वा साश्व एव व्यगाहत ॥ ६ ॥
'तत्पश्चात् राजाने उसके भीतर प्रवेश किया। उस वनस्थलीके मध्यभागमें एक अत्यन्त रमणीय सरोवर था। उसे देखकर राजा घोड़ेसहित सरोवरके जलमें घुस गये ॥ ६ ॥
अथाश्वस्तः स बिसमृणालमश्वायाग्रतो निक्षिप्य पुष्करिणीतीरे संविवेश । ततः शयानो मधुरं गीतमशृणोत् ॥ ७ ॥
'जल पीकर जब वे कुछ आश्वस्त हुए, तब घोड़ेके आगे कुछ कमलकी नालें डालकर स्वयं उस सरोवरके तटपर लेट गये। लेटे-ही-लेटे उनके कानोंमें कहींसे मधुर गीतकी ध्वनि सुनायी पड़ी ॥ ७ ॥
स श्रुत्वाचिन्तयन्नेह मनुष्यगतिं पश्यामि कस्य खल्वयं गीतशब्द इति ॥ ८ ॥
‘उसे सुनकर राजा सोचने लगे कि ‘यहाँ मनुष्योंकी गति तो नहीं दिखायी देती। फिर यह किसके गीतका शब्द सुनायी देता है’ ।। ८ ।।
अथापश्यत् कन्यां परमरूपदर्शनीयां पुष्पाण्यवचिन्वन्तीं गायन्तीं च। अथ सा राज्ञः समीपे पर्यक्रामत् ।। ९ ।।
‘इतनेहीमें उनकी दृष्टि एक कन्यापर पड़ी, जो अपने परम सुन्दर रूपके कारण देखने ही योग्य थी। वह वनके फूल चुनती हुई गीत गा रही थी। धीरे-धीरे भ्रमण करती हुई वह राजाके समीप आ गयी ।। ९ ।।
तामब्रवीद् राजा कस्यासि भद्रे का वा त्वमिति। सा प्रत्युवाच कन्याऽस्मीति तां राजोवाचार्थी त्वयाहमिति ।। १० ।।
‘तब राजाने उससे पूछा—‘कल्याणी! तुम कौन और किसकी हो?’ उसने उत्तर दिया—‘मैं कन्या हूँ—अभी मेरा विवाह नहीं हुआ है।’ तब राजाने उससे कहा—‘भद्रे! मैं तुझे चाहता हूँ’ ।। १० ।।
अथोवाच कन्या समयेनाहं शक्या त्वया लब्धुं नान्यथेति राजा तां समयमपृच्छत्। कन्योवाच नोदकं मे दर्शयितव्यमिति ।। ११ ।।
‘कन्या बोली’ तुम मुझे एक शर्तके साथ पा सकते हो अन्यथा नहीं।’ राजाने उससे वह शर्त पूछी। कन्याने कहा—‘मुझे कभी जलका दर्शन न कराना’ ।। ११ ।।
स राजा तां बाढमित्युक्त्वा तामुपयेमे कृतोद्वाहश्च राजा परीक्षित् क्रीडमानो मुदा परमया युक्तस्तूष्णीं सङ्गम्य तया सहास्ते ।। १२ ।।
‘तब राजाने उससे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उससे (गान्धर्व) विवाह किया। विवाहके पश्चात् राजा परीक्षित् अत्यन्त आनन्दपूर्वक उसके साथ क्रीड़ा-विहार करने लगे और एकान्तमें मिलकर उसके साथ चुपचाप बैठे रहे ।। १२ ।।
ततस्तत्रैवासीने राजनि सेनान्वगच्छत् ।। १३ ।।
‘राजा अभी वहीं बैठे थे, इतनेहीमें उनकी सेना आ पहुँची ।। १३ ।।
सा सेनोपविष्टं राजानं परिवार्थ्यातिष्ठत्। पर्याश्वस्तश्च राजा तयैव सह शिबिकया प्रायादव-घोटितया स स्वं नगरमनुप्राप्य रहसि तया सहास्ते ।। १४ ।।
‘वह सेना अपने बैठे हुए राजाको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयी। अच्छी तरह सुस्ता लेनेके पश्चात् राजा एक साफ-सुथरी चिकनी पालकीमें उसीके साथ बैठकर अपने नगरको चल दिये और वहाँ पहुँचकर उस नवविवाहिता सुन्दरीके साथ एकान्तवास करने लगे ।। १४ ।।
तत्राभ्याशस्थोऽपि कश्चिन्नापश्यदथ प्रधानामा-त्योऽभ्याशचरास्तस्य स्त्रियोऽपृच्छत् ।। १५ ।।
‘वहाँ निकट होते हुए भी कोई उनका दर्शन नहीं कर पाता था। तब एक दिन प्रधान मन्त्रीने राजाके पास रहनेवाली स्त्रियोंसे पूछा— ।। १५ ।।
किमत्र प्रयोजनं वर्तते इत्यथाब्रुवंस्ताः स्त्रियः ।। १६ ।। 'यहाँ तुम्हारा क्या काम है?' उनके ऐसा पूछनेपर उन स्त्रियोंने कहा— ।। १६ ।।
अपूर्वमिव पश्याम उदकं नात्र नीयत इत्यथामात्योऽनुदकं वनं कारयित्वोदारवृक्षं बहुपुष्प-फलमूलं तस्य मध्ये मुक्ताजालमयीं पार्श्वे वापीं गूढां सुधासलिललिप्तां स रहस्युपगम्य राजान-मब्रवीत् ।। १७ ।। 'हमें यहाँ एक अद्भुत-सी बात दिखायी देती है। महाराजके अन्तःपुरमें पानी नहीं जाने पाता है। (हमलोग इसीकी चौकसी करती हैं।)' उनकी यह बात सुनकर प्रधान मन्त्रीने एक बाग लगवाया, जिसमें प्रत्यक्षरूपसे कोई जलाशय नहीं था। उसमें बड़े सुन्दर और ऊँचे-ऊँचे वृक्ष लगवाये गये थे। वहाँ फल-फूल और कन्द-मूलकी भी बहुतायत थी। उस उपवनके मध्यभागमें एक किनारेकी ओर सुधाके समान स्वच्छ जलसे भरी हुई एक बावली भी बनवायी थी, जो मोतियोंके जालसे निर्मित थी। उस बावलीको (लताओंद्वारा) बाहरसे ढक दिया गया था। उस उद्यानके तैयार हो जानेपर मन्त्रीने किसी दिन राजासे मिलकर कहा— ।। १७ ।।
वनमिदमुदारकं साध्वत्र रम्यतामिति ।। १८ ।। 'महाराज! यह वन बहुत सुन्दर है, आप इसमें भलीभाँति विहार करें' ।। १८ ।।
स तस्य वचनात् तयैव सह देव्या तद् वनं प्राविशत्। स कदाचित् तस्मिन् कानने रम्ये तयैव सह व्यवाहरदथ क्षुत्तृष्णार्दितः श्रान्तोऽतिमुक्त-कागारमपश्यत् ।। १९ ।। 'मन्त्रीके कहनेसे राजाने उसी नवविवाहिता रानीके साथ उस वनमें प्रवेश किया। एक दिन महाराज परीक्षित् उस रमणीय उद्यानमें अपनी उसी प्रियतमाके साथ विहार कर रहे थे। विहार करते-करते जब वे थक गये और भूख-प्याससे बहुत पीड़ित हो गये, तब उन्हें वासन्ती लताद्वारा निर्मित एक मनोहर मण्डप दिखायी दिया ।। १९ ।।
तत् प्रविश्य राजा सह प्रियया सुधाकृतां विमलां सलिलपूर्णां वापीमपश्यत् ।। २० ।। 'उस मण्डपमें प्रियसहित प्रवेश करके राजाने सुधाके समान स्वच्छ जलसे परिपूर्ण वह बावली देखी ।। २० ।।
दृष्ट्वैव च तां तस्याश्च तीरे सहैव तया देव्याऽवातिष्ठत् ।। २१ ।। 'उसे देखकर वे अपनी रानीके साथ उसीके तटपर खड़े हुए ।। २१ ।।
अथ तां देवीं स राजाब्रवीत् साध्ववतर वापीसलिलमिति । सा तद्वचः श्रुत्वावतीर्य वापीं न्यमज्जन्न पुनरुदमज्जत् ।। २२ ।। 'उस समय राजाने उस रानीसे कहा—'देवि! सावधानीके साथ इस बावलीके जलमें उतरो।' राजाकी यह बात सुनकर उसने बावलीमें घुसकर गोता लगाया और फिर बाहर नहीं निकली ।। २२ ।।
तां स मृगयमाणो राजा नापश्यद् वापीमथ निःस्राव्य मण्डूकं श्वभ्रमुखे दृष्ट्वा क्रुद्ध आज्ञापयामास स राजा ॥ २३ ॥
सर्वत्र मण्डूकवधः क्रियतामिति यो मयार्थी स मां मृतमण्डूकोपायनमादायोपतिष्ठेदिति ॥ २४ ॥
'राजाने उस वापीमें रानीकी बहुत खोज की, परंतु वह कहीं दिखायी न दी। तब उन्होंने बावलीका सारा जल निकलवा दिया। इसके बाद एक बिलके मुँहपर कोई मेढक दीख पड़ा। इससे राजाको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दे दी कि 'सर्वत्र मेढकोंका वध किया जाय। जो मुझसे मिलना चाहे, वह मरे हुए मेढकका ही उपहार लेकर मेरे पास आवे' ॥ २३-२४ ॥
अथ मण्डूकवधे घोरे क्रियमाणे दिक्षु सर्वासु मण्डूकान् भयमाविवेश । ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥ २५ ॥
'इस आज्ञाके अनुसार चारों ओर मेढकोंका भयंकर संहार आरम्भ हो गया। इससे सब दिशाओंके मेढकोंके मनमें भय समा गया। वे डरकर मण्डूकराजके पास गये और उनसे सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया ॥ २५ ॥
ततो मण्डूकराट् तापसवेषधारी राजानमभ्य-गच्छदुपैत्य चैनमुवाच ॥ २६ ॥
'तब मण्डूकराज तपस्वीका वेष धारण करके राजाके पास गया और निकट पहुँचकर उससे इस प्रकार बोला— ॥ २६ ॥
मा राजन् क्रोधवशं गमः प्रसादं कुरु नार्हसि मण्डूकानामपराधिनां वधं कर्तुमिति । श्लोकौ चात्र भवतः— ॥ २७ ॥
'राजन्! आप क्रोधके वशीभूत न हों। हमपर कृपा करें। निरपराध मेढकोंका वध न करावें।' इस विषयमें ये दो श्लोक भी प्रसिद्ध हैं— ॥ २७ ॥
मा मण्डूकान् जिघांस त्वं
कोपं संधारयाच्युत ।
प्रक्षीयते धनोद्रेको
जनानामविजानताम् ॥ २८ ॥
अच्युत! आप मेढकोंको मारनेकी इच्छा न करें। अपने क्रोधको रोकें; क्योंकि अविवेकसे काम लेनेवाले मनुष्योंके धनकी वृद्धि नष्ट हो जाती है ॥ २८ ॥
प्रतिजानीहि नैतांस्त्वं
प्राप्य क्रोधं विमोक्ष्यसि ।
अलं कृत्वा तवाधर्मं
मण्डूकैः किं हतैर्हि ते ॥ २९ ॥
'प्रतिज्ञा करें कि इन मेढकोंको पाकर आप क्रोध नहीं करेंगे; यह अधर्म करनेसे आपको क्या लाभ है? मण्डूकोंकी हत्यासे आपको क्या मिलेगा?' ॥ २९ ॥
तमेवंवादिनमिष्टजनशोकपरीतात्मा राजा-थोवाच ॥ ३० ॥
राजाका हृदय अपनी प्यारी रानीके विनाशके शोकसे दग्ध हो रहा था। उन्होंने उपर्युक्त बातें कहनेवाले मण्डूकराजसे कहा— ॥ ३० ॥
न हि क्षम्यते तन्मया हनिष्याम्येतानेतैर्दुरात्मभिः प्रिया मे भक्षिता सर्वथैव मे वध्या मण्डूका नार्हसि विद्वन् मामुपरोद्धुमिति ॥ ३१ ॥
‘मैं क्षमा नहीं कर सकता। इन मेढकोंको अवश्य मारूँगा। इन दुरात्माओंने मेरी प्रियतमाको खा लिया है। अतः ये मेढक मेरे लिये सर्वथा वध्य ही हैं। विद्वन्! आप मुझे उनके वधसे न रोकें’ ॥ ३१ ॥
स तद् वाक्यमुपलभ्य व्यथितेन्द्रियमनाः प्रोवाच प्रसीद राजन्नहमायुर्नाम मण्डूकराजो मम सा दुहिता सुशोभना नाम । तस्या हि दौःशील्यमेतद् बहवस्तया राजानो विप्रलब्धाः पूर्वा इति ॥ ३२ ॥
‘राजाकी बात सुनकर मण्डूकराजका मन और इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं। वह बोला—‘महाराज! प्रसन्न होइये। मेरा नाम आयु है। मैं मेढकोंका राजा हूँ। जिसे आप अपनी प्रियतमा कहते हैं, वह मेरी ही पुत्री है। उसका नाम सुशोभना है। वह आपको छोड़कर चली गयी, यह उसकी दुष्टता है। उसने पहले भी बहुत-से राजाओंको धोखा दिया है’ ॥ ३२ ॥
तमब्रवीद् राजा तया समर्थी सा मे दीयतामिति ॥ ३३ ॥
तब राजाने मण्डूकराजसे कहा—‘मैं तुम्हारी उस पुत्रीको चाहता हूँ, उसे मुझे समर्पित कर दो’ ॥ ३३ ॥
अथैनां राजे पितादादब्रवीच्चैनामेनं राजानं शुश्रूषस्वेति ॥ ३४ ॥
स एवमुक्त्वा दुहितरं क्रुद्धः शशाप यस्मात् त्वया राजानो विप्रलब्धा बहवस्तस्मादब्रह्मण्यानि तवापत्यानि भविष्यन्त्यानृतिकत्वात् तवेति ॥ ३५ ॥