भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1319

अक्रमेण मनुष्याणां भविष्यन्ति तदा क्रियाः ।
विरोधमथ यास्यन्ति वृषला ब्राह्मणैः सह ॥ ७१ ॥
मनुष्योंकी सारी क्रियाएँ क्रमसे विपरीत होंगी। शूद्र ब्राह्मणोंके साथ विरोध करेंगे ॥ ७१ ॥

मही म्लेच्छजनाकीर्णा भविष्यति ततोऽचिरात् ।
करभारभयाद् विप्रा भजिष्यन्ति दिशो दश ॥ ७२ ॥
सारी पृथ्वी थोड़े ही समयमें म्लेच्छोंसे भर जायगी। ब्राह्मणलोग करोंके भारसे भयभीत होकर दसों दिशाओंकी शरण लेंगे ॥ ७२ ॥

निर्विशेषा जनपदास्तथा विष्टिकरादिताः ।
आश्रमानुपलप्स्यन्ति फलमूलोपजीविनः ॥ ७३ ॥
सारे जनपद एक-जैसे आचार और वेशभूषा बना लेंगे। लोग बेगार लेनेवालों और कर लेनेवालोंसे पीड़ित हो एकान्त आश्रमोंमें चले जायँगे और फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करेंगे ॥ ७३ ॥

एवं पर्याकुले लोके मर्यादा न भविष्यति ।
न स्थास्यन्त्युपदेशे च शिष्या विप्रियकारिणः ॥ ७४ ॥
इस तरह उथल-पुथल मच जानेपर संसारमें कोई मर्यादा नहीं रह जायगी। शिष्य गुरुके उपदेशपर नहीं चलेंगे। वे उलटे उनका अहित करेंगे ॥ ७४ ॥

आचार्योऽपनिधिश्चैव भर्त्स्यते तदनन्तरम् ।
अर्थयुक्त्या प्रवत्स्यन्ति मित्रसम्बन्धिबान्धवाः ॥ ७५ ॥
अपने कुलका आचार्य भी यदि निर्धन हो तो उसे निरन्तर शिष्योंकी डाँट-फटकार सुननी पड़ेगी। मित्र, सम्बन्धी या भाई-बन्धु धनके लालचसे ही अपने पास रहेंगे ॥

अभावः सर्वभूतानां युगान्ते सम्भविष्यति ।
दिशः प्रज्वलिताः सर्वा नक्षत्राण्यप्रभाणि च ॥ ७६ ॥
युगान्तकाल आनेपर समस्त प्राणियोंका अभाव हो जायगा। सारी दिशाएँ प्रज्वलित हो उठेंगी और नक्षत्रोंकी प्रभा विलुप्त हो जायगी ॥ ७६ ॥

ज्योतींषि प्रतिकूलानि वाताः पर्याकुलास्तथा ।
उल्कापाताश्च बहवो महाभयनिदर्शकाः ॥ ७७ ॥
ग्रह उलटी गतिसे चलने लगेंगे। हवा इतनी जोरसे चलेगी कि लोग व्याकुल हो उठेंगे। महान् भयकी सूचना देनेवाले उल्कापात बार-बार होते रहेंगे ॥ ७७ ॥

षड्भिरन्यैश्च सहितो भास्करः प्रतपिष्यति ।
तुमुलाश्चापि निर्ह्रादा दिग्दाहाश्चापि सर्वशः ॥ ७८ ॥
एक सूर्य तो है ही, छः और उदय होंगे और सातों एक साथ तपेंगे। सब ओर बिजलीकी भयानक गड़गड़ाहट होगी, सब दिशाओंमें आग लगेगी ॥ ७८ ॥