भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1318

कुराजभिश्च सततं करभारप्रपीडिताः ।। ६२ ।।
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसंक्षये ।
विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारकाः ।। ६३ ।।
राजन्! श्रेष्ठ ब्राह्मण भी लुटेरोंसे पीड़ित होकर कौओंकी तरह काँव-काँव करते फिरेंगे। दुष्ट राजाओंके लगाये हुए करोंके भारसे सदा पीड़ित होनेके कारण वे धैर्य छोड़कर चल देंगे और शूद्रोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहकर धर्मविरुद्ध कार्य करेंगे। भूपाल! भयंकर कलियुगके अन्तमें जगत्की यही दशा होगी ।। ६२-६३ ।।

शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति ब्राह्मणाः पर्युपासकाः ।
श्रोतारश्च भविष्यन्ति प्रामाण्येन व्यवस्थिताः ।। ६४ ।।
विपरीतश्च लोकोऽयं भविष्यत्यधरोत्तरः ।
एडूकान् पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः ।। ६५ ।।
शूद्र धर्मोपदेश करेंगे और ब्राह्मणलोग उनकी सेवामें रहकर उसे सुनेंगे तथा उसीको प्रामाणिक मानकर उसका पालन करेंगे। समस्त लोकका व्यवहार विपरीत और उलट-पुलट हो जायगा। ऊँच नीच और नीच ऊँच हो जायेंगे। लोग हड्डी जड़ी हुई दीवारोंकी तो पूजा करेंगे और देवविग्रहोंको त्याग देंगे ।। ६४-६५ ।।

शूद्राः परिचरिष्यन्ति न द्विजान् युगसंक्षये ।
आश्रमेषु महर्षीणां ब्राह्मणावसथेषु च ।। ६६ ।।
देवस्थानेषु चैत्येषु नागानामालयेषु च ।
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता ।। ६७ ।।
युगान्तकालमें शूद्र द्विजातियोंकी सेवा नहीं करेंगे। वह समय आनेपर महर्षियोंके आश्रमोंमें, ब्राह्मणोंके घरोंमें, देवस्थानोंमें, चैत्यवृक्षोंके आस-पास और नागलयोंमें जो भूमि होगी, उसपर हड्डी जड़ी हुई दीवारोंका चिह्न तो उपलब्ध होगा; परंतु देवमन्दिर उस भूमिकी शोभा नहीं बढ़ायेंगे ।। ६६-६७ ।।

भविष्यति युगे क्षीणे तद् युगान्तस्य लक्षणम् ।
यदा रौद्रा धर्महीना मांसादाः पानपास्तथा ।। ६८ ।।
भविष्यन्ति नरा नित्यं तदा संक्षेप्स्यते युगम् ।
यह सब युगान्तका लक्षण समझना चाहिये। जब सब मानव सदा भयंकर स्वभाववाले, धर्महीन, मांसखोर और शराबी हो जायेंगे, उस समय युगका संहार होगा ।।

पुष्पं पुष्पे यदा राजन् फले वा फलमाश्रितम् ।। ६९ ।।
प्रजास्यति महाराज तदा संक्षेप्स्यते युगम् ।
अकालवर्षी पर्जन्यो भविष्यति गते युगे ।। ७० ।।
महाराज! जब फूलमें फूल, फलमें फल लगने लगेगा, उस समय युगका संहार होगा। युगान्तकालमें मेघ असमयमें ही वर्षा करेंगे ।। ६९-७० ।।