भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1317

क्रयविक्रयकाले च सर्वः सर्वस्य वञ्चनम् ।
युगान्ते भरतश्रेष्ठ वित्तलोभात् करिष्यति ॥ ५४ ॥
भरतश्रेष्ठ! युगान्तकालमें धनके लोभसे क्रय-विक्रयके समय सभी सबको ठगेंगे ॥ ५४ ॥
ज्ञानानि चाप्यविज्ञाय करिष्यन्ति क्रियास्तथा ।
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते युगान्ते समुपस्थिते ॥ ५५ ॥
क्रियाके तत्त्वको न जानकर भी लोग उसे करनेमें प्रवृत्त होंगे। युगान्तकालके सभी मानव स्वेच्छाचारी हो जायेंगे ॥ ५५ ॥
स्वभावात् क्रूरकर्माणश्चान्योन्यमभिशंसिनः ।
भवितारो जनाः सर्वे सम्प्राप्ते तु युगक्षये ॥ ५६ ॥
आरामांश्चैव वृक्षांश्च नाशयिष्यन्ति निर्व्यथाः ।
भविता संशयो लोके जीवितस्य हि देहिनाम् ॥ ५७ ॥
सभी स्वभावतः क्रूर और एक-दूसरेपर मिथ्या कलंक लगानेवाले होंगे। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर सब लोग बगीचों और वृक्षोंको कटवा देंगे और ऐसा करते समय उनके मनमें पीड़ा नहीं होगी। प्रत्येक मनुष्यके जीवनधारणमें भी शंका हो जायगी। अर्थात् प्रत्येक मनुष्यका जीवन धारण करना कठिन हो जायगा ॥ ५६-५७ ॥
तथा लोभाभिभूताश्च भविष्यन्ति नरा नृप ।
ब्राह्मणांश्च हनिष्यन्ति ब्राह्मणस्वोपभोगिनः ॥ ५८ ॥
राजन्! सब लोग लोभके वशीभूत होंगे और ब्राह्मणोंका धन उपभोग करनेका जिनका स्वभाव पड़ गया है, वे धनके लिये ब्राह्मणोंको मार भी डालेंगे ॥
हाहाकृता द्विजाश्चैव भयार्ता वृषलार्दिताः ।
त्रातारमलभन्तो वै भ्रमिष्यन्ति महीमिमाम् ॥ ५९ ॥
शूद्रोंके सताये हुए ब्राह्मण भयसे पीड़ित हो हाहाकार करने लगेंगे और अपने लिये कोई रक्षक न मिलनेके कारण सारी पृथ्वीपर निश्चय ही भटकते फिरेंगे ॥ ५९ ॥
जीवितान्तकराः क्रूरा रौद्राः प्राणिविहिंसकाः ।
यदा भविष्यन्ति नरास्तदा संक्षेप्स्यते युगम् ॥ ६० ॥
जब दूसरोंके जीवनका विनाश करनेवाले क्रूर, भयंकर तथा जीवहिंसक मनुष्य पैदा होने लगें, तब समझ लेना चाहिये कि युगान्तकाल उपस्थित हो गया ॥
आश्रयिष्यन्ति च नदीः पर्वतान् विषमाणि च ।
प्रधावमाना वित्रस्ता द्विजाः कुरुकुलोद्वह ॥ ६१ ॥
कुरुकुलतिलक युधिष्ठिर! अत्याचारियोंसे डरे हुए ब्राह्मण इधर-उधर भागकर नदियों, पर्वतों तथा दुर्गम स्थानोंका आश्रय लेंगे ॥ ६१ ॥
दस्युभिः पीडिता राजन् काका इव द्विजोत्तमाः ।