महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1326, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकस्मिन् धर्मे मया स्थेयं प्रजाः संरक्षता मुने ॥ २२ ॥ कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मतः । ‘मुने! प्रजाकी रक्षा करते हुए किस धर्ममें स्थित रहना चाहिये। मेरा व्यवहार और बर्ताव कैसा हो, जिससे मैं स्वधर्मसे कभी च्युत न होऊँ?’ ॥ २२ ½ ॥
मार्कण्डेय उवाच
दयावान् सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयकः ॥ २३ ॥ सत्यवादी मृदुर्दान्तः प्रजानां रक्षणे रतः । चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन् देवांश्च पूजय ॥ २४ ॥ मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तुम सब प्राणियोंपर दया करो। सबके हितैषी बने रहो। सबपर प्रेमभाव रखो और किसीमें दोषद्दष्टि मत करो। सत्यवादी, कोमलस्वभाव, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर रहकर धर्मका आचरण करो। अधर्मको दूरसे ही त्याग दो तथा देवता और पितरोंकी आराधना करते रहो ॥ २३-२४ ॥
प्रमादाद् यत् कृतं तेऽभूत् सम्यग् दानेन तज्जय । अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान् भव ॥ २५ ॥ यदि प्रमादवश तुम्हारेद्वारा किसीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार हो गया हो तो उसे अच्छी प्रकार दानसे संतुष्ट करके वशमें करो। मैं सबका स्वामी हूँ, ऐसे अहंकारको कभी पासमें न आने दो। तुम अपनेको सदा पराधीन समझते रहो ॥ २५ ॥
विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव । एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः ॥ २६ ॥ न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदतीतानागतं भुवि । तस्मादिमं परिक्लेशं त्वं तात हृदि मा कृथाः ॥ २७ ॥ सारी पृथ्विको जीतकर सदा सानन्द और सुखी रहो। तात युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें जो यह धर्म बताया है, इसका पालन भूतकालमें भी हुआ है और भविष्यकालमें भी इसका पालन होना चाहिए। भूत और भविष्यकी ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; अतः इस समय जो यह क्लेश तुम्हें प्राप्त हुआ है, इसके लिये हृदयमें कोई विचार न करो ॥ २६-२७ ॥
प्राज्ञास्तात न मुह्यन्ति कालेनापि प्रपीडिताः । एष कालो महाबाहो अपि सर्वदिवौकसाम् ॥ २८ ॥ तात! विद्वान् पुरुष कालसे पीड़ित होनेपर भी कभी मोहमें नहीं पड़ते। महाबाहो! यह काल सम्पूर्ण देवताओंपर भी अपना प्रभाव डालता है ॥ २८ ॥
मुह्यन्ति हि प्रजास्तात कालेनापि प्रचोदिताः । मा च तत्र विशङ्काभूद् यन्मयोक्तं तवानघ ॥ २९ ॥