महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1325, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मका यह स्वरूप सत्ययुगमें अक्षुण्ण रहेगा। त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें धर्मकी जैसी स्थिति रहेगी, उसका वर्णन तुमसे किया जा चुका है। पाण्डुनन्दन! तुम्हें सम्पूर्ण लोककी युग-संख्याका ज्ञान भी हो चुका है॥ १४-१५॥
एतत् ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं तथा।
वायुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम्॥ १६॥
राजन्! ऋषियोंद्वारा प्रशंसित तथा वायुदेवद्वारा वर्णित पुराणकी बातोंका स्मरण करके मैंने तुमसे यह भूत-भविष्यका सारा वृत्तान्त बताया है॥ १६॥
एवं संसारमार्गा मे बहुशश्चिरजीविना।
दृष्टाश्चैवानुभूताश्च तांस्ते कथितवानहम्॥ १७॥
इस प्रकार चिरजीवी होनेके कारण मैंने संसारके मार्गोंका अनेक बार दर्शन और अनुभव किया है, जिनका तुम्हारे समक्ष वर्णन कर दिया है॥ १७॥
इदं चैवापरं भूयः सह भ्रातृभिरच्युत।
धर्मसंशयमोक्षार्थं निबोध वचनं मम॥ १८॥
धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंसहित यह मेरी एक बात और सुनो। धर्मविषयक संदेहका निवारण करनेके लिये मेरे वचनको ध्यान देकर सुनो॥ १८॥
धर्मे त्वयाऽऽत्मा संयोज्यो नित्यं धर्मभृतां वर।
धर्मात्मा हि सुखं राजन् प्रेत्य चेह च नन्दति॥ १९॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने-आपको सदा धर्ममें ही लगाये रखना चाहिये; क्योंकि धर्मात्मा मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी बड़े सुखसे रहता है॥ १९॥
निबोध च शुभां वाणीं यां प्रवक्ष्यामि तेऽनघ।
न ब्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन॥ २०॥
ब्राह्मणः कुपितो हन्यादपि लोकान् प्रतिज्ञया।
निष्पाप नरेश! मेरी इस कल्याणमयी वाणीको समझो, जिसे मैं अभी तुम्हें सुना रहा हूँ। युधिष्ठिर! तुम्हें कभी किसी ब्राह्मणका तिरस्कार नहीं करना चाहिये; क्योंकि यदि ब्राह्मण कुपित हो जाय और किसी बातकी प्रतिज्ञा कर ले, तो वह उस प्रतिज्ञाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर सकता है॥ २० १/२॥
वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृपः॥ २१॥
उवाच वचनं धीमान् परं परमद्युतिः।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मार्कण्डेयजीकी यह बात सुनकर परम तेजस्वी और बुद्धिमान् कुरुकुलरत्न राजा युधिष्ठिरने यह उत्तम वचन कहा—॥ २१ १/२॥