भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1324, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1324

उस समय चोर और लुटेरे दर्दभरी वाणीमें ‘हाय मैया’, ‘हाय बप्पा’ और ‘हाय बेटा’ इत्यादि कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करेंगे और उन सबका भगवान् कल्की विनाश कर डालेंगे। भारत! दस्युओंके नष्ट हो जानेपर अधर्मका भी नाश हो जायगा और धर्मकी वृद्धि होने लगेगी। इस प्रकार सत्ययुग आ जानेपर सब मनुष्य सत्यकर्मपरायण होंगे।। ६-७।।

आरामाश्चैव चैत्याश्च तटाकावसथास्तथा। पुष्करिण्यश्च विविधा देवतायतनानि च।। ८।। यज्ञक्रियाश्च विविधा भविष्यन्ति कृते युगे। ब्राह्मणाः साधवश्चैव मुनयश्च तपस्विनः।। ९।। उस युगमें नये-नये बगीचे लगाये जायँगे। चैत्यवृक्षोंकी स्थापना होगी। पोखरों और धर्मशालाओंका निर्माण होगा। भाँति-भाँतिकी पोखरियाँ तैयार होंगी। कितने ही देवमन्दिर बनेंगे और नाना प्रकारके यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान होगा। ब्राह्मण साधु-स्वभावके होंगे। मुनिलोग तपस्यामें तत्पर रहेंगे।। ८-९।।

आश्रमा हतपाखण्डाः स्थिताः सत्यरताः प्रजाः। जनिष्यन्ते च बीजानि रोप्यमाणानि चैव ह।। १०।। आश्रम पाखण्डियोंसे रहित होंगे और सारी प्रजा सत्यपरायण होगी। खेतोंमें बोये जानेवाले सब प्रकारके बीज अच्छी तरह उगेंगे।। १०।।

सर्वेष्वृतुषु राजेन्द्र सर्वं सस्यं भविष्यति। नरा दानेषु निरता व्रतेषु नियमेषु च।। ११।। राजेन्द्र! सभी ऋतुओंमें सभी प्रकारके अनाज पैदा होंगे। सब लोग दान, व्रत और नियमोंमें लगे रहेंगे।। ११।।

जपयज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युताः। पालयिष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुन्धराम्।। १२।। ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक जपयज्ञमें तत्पर रहेंगे और धर्ममें ही उनकी रुचि होगी। क्षत्रियनरेश धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करेंगे।। १२।।

व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे। षट्कर्मनिरता विप्राः क्षत्रिया विक्रमे रताः।। १३।। शुश्रूषायां रताः शूद्रास्तथा वर्णत्रयस्य च। सत्ययुगके वैश्य सदा न्यायपूर्वक व्यापार करनेवाले होंगे। ब्राह्मण यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें तत्पर रहेंगे। क्षत्रिय बल-पराक्रममें अनुराग रखेंगे तथा शूद्र ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवामें लगे रहेंगे।। १३ १/२।।

एष धर्मः कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा।। १४।। पश्चिमे युगकाले च यः स ते सम्प्रकीर्तितः। सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव।। १५।।