भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1322

मनके द्वारा चिन्तन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र-शस्त्र, योद्धा और कवच उपस्थित हो जायँगे। वह धर्मविजयी चक्रवर्ती राजा होगा ॥ ९४-९५ ॥ स चेमं संकुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति । उत्थितो ब्राह्मणो दीप्तः क्षयान्तकृदुदारधीः ॥ ९६ ॥ वह उदारबुद्धि, तेजस्वी ब्राह्मण, दुःखसे व्याप्त हुए इस जगत्को आनन्द प्रदान करेगा। कलियुगका अन्त करनेके लिये ही उसका प्रादुर्भाव होगा ॥ ९६ ॥ संक्षेपको हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तकः । स सर्वत्र गतान् क्षुद्रान् ब्राह्मणैः परिवारितः । उत्सादयिष्यति तदा सर्वम्लेच्छगणान् द्विजः ॥ ९७ ॥ वही सम्पूर्ण कलियुगका संहार करके नूतन सत्ययुगका प्रवर्तक होगा। वह ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ सर्वत्र विचरेगा और भूमण्डलमें सर्वत्र फैले हुए नीच स्वभाववाले सम्पूर्ण म्लेच्छोंका संहार कर डालेगा ॥ ९७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि भविष्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें भविष्यवर्णनविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३/२ श्लोक मिलाकर कुल ९७ ३/२ श्लोक हैं)