महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1342, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेखो ।। ६५ ।।
वामदेव उवाच
यत् त्वमेनं सायकं घोररूपं विषेण दिग्धं मम संदधासि । न त्वेतं त्वं शरवर्षं विमोक्तुं संधातुं वा शक्यसे मानवेन्द्र ।। ६६ ।। **वामदेवजीने कहा—**नरेश्वर! तुम विषके बुझाये हुए इस विकराल बाणको मुझे मारनेके लिये धनुषपर चढ़ा रहे हो, परंतु मैं कहे देता हूँ 'इस बाणको न तो तुम धनुषपर रख सकोगे और न छोड़ ही सकोगे' ।। ६६ ।।
राजोवाच
इक्ष्वाकवः पश्यत मां गृहीतं न वै शक्नोम्येष शरं विमोक्तुम् । न चास्य कर्तुं नाशमभ्युत्सहामि आयुष्मान् वै जीवतु वामदेवः ।। ६७ ।। **राजा बोले—**इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! देखो, मैं फँस गया। अब यह बाण नहीं छोड़ सकूँगा। इसलिये वामदेवको नष्ट करनेका उत्साह जाता रहा। अतः यह महर्षि दीर्घायु होकर जीवित रहे ।। ६७ ।।
वामदेव उवाच
संस्पृश्यैनां महिषीं सायकेन ततस्तस्मादेनसो मोक्ष्यसे त्वम् । ततस्तथा कृतवान् पार्थिवस्तु ततो मुनिं राजपुत्री बभाषे ।। ६८ ।। **वामदेवजीने कहा—**राजन्! तुम इस बाणसे अपनी रानीका स्पर्श कर लेनेपर ब्रह्महत्याके पापसे छूट जाओगे। तब राजाने ऐसा ही किया। तदनन्तर राजपुत्रीने मुनिसे कहा ।। ६८ ।।
राजपुत्र्युवाच
यथा युक्ता वामदेवाहमैनं दिने दिने संदिशन्ती नृशंसम् । ब्राह्मणेभ्यो मृगयती सूनृतानि तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ।। ६९ ।।