महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1343, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें**राजपुत्री बोली—**वामदेवजी! मैं इन कठोर स्वभाववाले अपने स्वामीको प्रतिदिन सावधान रहकर मीठे वचन बोलनेकी सलाह देती रहती हूँ और स्वयं ब्राह्मणोंकी सेवाका अवसर ढूँढ़ती हूँ। ब्रह्मन्! इन सत्कर्मोंके कारण मुझे पुण्यलोककी प्राप्ति हो ॥ ६९ ॥
वामदेव उवाच
त्वया त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे
वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते ।
प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि
इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ॥ ७० ॥
**वामदेवने कहा—**शुभ दृष्टिवाली अनिन्द्य राजकुमारी! तुमने इस राजकुलको ब्राह्मणके कोपसे बचा लिया। इसके लिये कोई अनुपम वर माँगो। मैं तुम्हें अवश्य दूँगा। तुम इन स्वजनोंके हृदय और विशाल इक्ष्वाकु-राज्यपर शासन करो ॥ ७० ॥
राजपुत्र्युवाच
वरं वृणे भगवंस्त्वेवमेष
विमुच्यतां किल्बिषादद्य भर्ता ।
शिवेन चाध्याहि सपुत्रबान्धवं
वरो वृतो ह्येष मया द्विजाग्र्य ॥ ७१ ॥
**राजकुमारी बोली—**भगवन्! मैं यही चाहती हूँ कि मेरे ये पति आज सब पापोंसे छुटकारा पा जायँ। आप यह आशीर्वाद दें कि ये पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित सुखसे रहें। विप्रवर! मैंने आपसे यही वर माँगा है ॥ ७१ ॥
मार्कण्डेय उवाच
श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या-
स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर ।
ततः स राजा मुदितो बभूव
वाम्यौ चास्मै प्रददौ सम्प्रणम्य ॥ ७२ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिर! राजपुत्रीकी यह बात सुनकर वामदेव मुनिने कहा—'ऐसा ही होगा।' तब राजा दल बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महर्षिको प्रणाम करके वे दोनों वाम्य अश्व उन्हें लौटा दिये ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि मण्डूकोपाख्याने
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
मण्डूकोपाख्यानविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥