महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1345, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
इन्द्र और बक मुनिका संवाद
वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयमृषयो ब्राह्मणा युधिष्ठिरश्च पर्यपृच्छन्नृषिः केन दीर्घायुरासीद् बको मार्कण्डेयस्तु तान् सर्वानुवाच ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! एक दिन ऋषियों, ब्राह्मणों तथा युधिष्ठिरने मार्कण्डेय मुनिसे पूछा—'ब्रह्मन्! महर्षि बक कैसे दीर्घायु हुए थे?' तब मार्कण्डेयजीने उन सबसे कहा— ॥ १ ॥
महातपा दीर्घायुश्च बको राजन् नात्र कार्या विचारणा ॥ २ ॥
'राजन्! बक महान् तपस्वी होनेके कारण दीर्घायु हुए थे। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये' ॥ २ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सह भारत ।
मार्कण्डेयं पर्यपृच्छद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
भरतनन्दन जनमेजय! मार्कण्डेयजीका यह कथन सुनकर भाइयोंसहित कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः पूछा— ॥ ३ ॥
श्रूयते हि महाभाग बको दाल्भ्यो महातपाः ।
प्रियः सखा च शक्रस्य चिरजीवी च सत्तम ॥ ४ ॥
महाभाग मुनिश्रेष्ठ! दल्भके पुत्र महातपस्वी बक ऋषि चिरजीवी तथा देवराज इन्द्रके प्रिय मित्र सुने जाते हैं ॥ ४ ॥
एतदिच्छामि भगवन् बकशक्रसमागमम् ।
सुखदुःखसमायुक्तं तत्त्वेन कथयस्व मे ॥ ५ ॥
'भगवन्! बक और इन्द्रका यह समागम (चिरजीवी पुरुषोंके) सुख और दुःखकी वार्तासे युक्त कहा गया है। मैं इसे सुनना चाहता हूँ; आप यथार्थरूपसे इसका वर्णन करें' ॥ ५ ॥
मार्कण्डेय उवाच
वृत्ते देवासुरे राजन् संग्रामे लोमहर्षणे ।
त्रयाणामपि लोकानामिन्द्रो लोकाधिपोऽभवत् ॥ ६ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! जब रोंगटे खड़े कर देनेवाला देवासुर-संग्राम समाप्त हो गया, उस समय लोकपाल इन्द्र तीनों लोकोंके अधिपति बना दिये गये ॥ ६ ॥
सम्यग् वर्षति पर्जन्ये सस्यसम्पद उत्तमाः ।