भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1346, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1346

निरामयाः सुधर्मिष्ठाः प्रजा धर्मपरायणाः ॥ ७ ॥ इन्द्रके शासनकालमें मेघ ठीक समयपर अच्छी वर्षा करते और खेतीकी उपज अच्छी होती थी। सारी प्रजा रोग-व्याधिसे रहित, धर्ममें स्थित तथा धर्मको ही अपना परम आश्रय माननेवाली थी ॥ ७ ॥

मुदितश्च जनः सर्वः स्वधर्मेषु व्यवस्थितः । ताः प्रजा मुदिताः सर्वा दृष्ट्वा बलनिषूदनः ॥ ८ ॥ ततस्तु मुदितो राजन् देवराजः शतक्रतुः । ऐरावतं समास्थाय ताः पश्यन् मुदिताः प्रजाः ॥ ९ ॥ सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने धर्मोंमें स्थित रहते थे। अपनी उन सारी प्रजाको आनन्दित देखकर बलासुरके शत्रु देवराज इन्द्र बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करते थे। एक दिनकी बात है, इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो चैनसे दिन बिताती हुई अपनी प्रजाको देखनेके लिये भ्रमण करने लगे ॥ ८-९ ॥

आश्रमांश्च विचित्रांश्च नदींश्च विविधाः शुभाः । नगराणि समृद्धानि खेटान् जनपदांस्तथा ॥ १० ॥ प्रजापालनदक्षांश्च नरेन्द्रान् धर्मचारिणः । उदपानं प्रपा वापी तडागानि सरांसि च ॥ ११ ॥ नाना ब्रह्मसमाचारैः सेवितानि द्विजोत्तमैः । ततोऽवतीर्य रम्यायां पृथ्व्यां राजञ्छतक्रतुः ॥ १२ ॥ राजन्! विचित्र आश्रमों, नाना प्रकारकी कल्याण-कारिणी नदियों, समृद्धिशाली नगरों, गाँवों, जनपदों, प्रजापालन-कुशल धर्मात्मा नरेशों, कुओं, पौसलों, बावलियों, तालाबों तथा ब्रह्मचर्यपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सेवित अनेकानेक सरोवरोंका अवलोकन करते हुए शतक्रतु इन्द्र एक रमणीय भूभागमें उतरे ॥ १०—१२ ॥

तत्र रम्ये शिवे देशे बहुवृक्षसमाकुले । पूर्वस्यां दिशि रम्यायां समुद्राभ्याशतो नृप ॥ १३ ॥ तत्राश्रमपदं रम्यं मृगद्विजनिषेवितम् । तत्राश्रमपदे रम्ये बकं पश्यति देवराट् ॥ १४ ॥ राजन्! परम सुन्दर पूर्वदिशामें समुद्रके निकट एक मनोहर एवं सुखद स्थानमें, जो बहुत-से वृक्षोंसे घिरा हुआ था, एक रमणीय आश्रम दिखायी दिया, जहाँ बहुत-से पशु और पक्षी निवास करते थे। देवराज इन्द्रने उस रमणीय आश्रममें जाकर बक मुनिका दर्शन किया ॥

बकस्तु दृष्ट्वा देवेन्द्रं दृढं प्रीतमनाभवत् । पाद्यासनार्घ्यदानेन फलमूलैरथार्चयत् ॥ १५ ॥

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