भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1347

देवराज इन्द्रको उपस्थित देख बकके हृदयमें दृढ़ प्रेम उत्पन्न हुआ। उन्होंने पाद्य, आसन, अर्घ्य और फल-मूलादि देकर देवराजका पूजन किया ।। १५ ।। सुखोपविष्टो वरदस्ततस्तु बलसूदनः । ततः प्रश्नं बकं देव उवाच त्रिदशेश्वरः ॥ १६ ॥ सबको वर देनेवाले बलनिषूदन देवेश्वर इन्द्र जब सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये, तब वे मुनिवर बकसे इस प्रकार बोले— ।। १६ ।।

शतं वर्षसहस्राणि मुने जातस्य तेऽनघ । समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १७ ॥ ‘निष्पाप मुने! आपकी अवस्था एक लाख वर्षकी हो गयी। ब्रह्मन्! आप अपने अनुभवके आधारपर यह बताइये कि चिरजीवी मनुष्योंको क्या दुःख होता है’? ।।

बक उवाच

अप्रियैः सह संवासः प्रियैश्चापि विनाभवः । असद्भिः सम्प्रयोगश्च तद् दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १८ ॥ **बकने कहा—**देवेश्वर! अप्रिय मनुष्योंके साथ रहना पड़ता है। प्रियजनोंकी मृत्यु हो जानेसे उनके वियोगका दुःख सहते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ता है और दुष्ट मनुष्योंका