महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः
क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व—सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा
वैशम्पायन उवाच
ततः पाण्डवाः पुनर्मार्कण्डेयमूचुः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पाण्डवोंने पुनः मार्कण्डेयजीसे प्रश्न किया ॥ १ ॥
कथितं ब्राह्मणमहाभाग्यं राजन्यमहाभाग्यमिदानीं शुश्रूषामह इति तानुवाच मार्कण्डेयो महर्षिः श्रूयता-मिति इदानीं राजन्यानां महाभाग्यमिति । कुरूणामन्य-तमः सुहोत्रो नाम राजा महर्षीनभिगम्य निवृत्य रथस्थमेव राजानमौशीनरं शिबिं ददर्शाभिमुखं तौ समेत्य परस्परेण यथावयः पूजां प्रयुज्य गुणसाम्येन परस्परेण तुल्यात्मानौ विदित्वान्योन्यस्य पन्थानं न ददतुस्तत्र नारदः प्रादुरासीत् किमिदं भवन्तौ परस्परस्य पन्थानमावृत्य तिष्ठत इति ॥ २ ॥
‘मुनिवर! आपने ब्राह्मणोंके माहात्म्यका तो वर्णन किया, अब हम क्षत्रियोंकी महत्ताके विषयमें इस समय कुछ सुनना चाहते हैं।' यह बात सुनकर महर्षि मार्कण्डेयने कहा—‘अच्छा सुनो। अब मैं क्षत्रियोंके माहात्म्यका वर्णन करता हूँ। कुरुवंशी क्षत्रियोंमें सुहोत्र नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। एक दिन वे महर्षियोंका सत्संग करके जब वहाँसे लौट रहे थे, उस समय उन्होंने अपने सामने ही रथपर बैठे हुए उशीनरपुत्र राजा शिबिको देखा। निकट आनेपर उन दोनोंने अवस्थाके अनुसार एक-दूसरेका सम्मान किया। परंतु गुणमें अपनेको बराबर समझकर एकने दूसरेके लिये राह नहीं दी। इतनेहीमें वहाँ देवर्षि नारदजी प्रकट हो गये और पूछ बैठे ‘यह क्या बात है' जो कि तुम दोनों इस तरह एक-दूसरेका मार्ग रोककर खड़े हो?' ॥ २ ॥