महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1352, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतावूचतुर्नारदं नैतद् भगवन् पूर्वकर्मकर्त्रादिभि-र्विशिष्टस्य पन्था उपदिश्यते समर्थाय वा आवां च सख्यं परस्परेणोपगतौ तच्चावधानतोऽत्युत्कृष्टमधरो-त्तरं परिभ्रष्टं नारदस्त्वेवमुक्तः श्लोकत्रयमपठत्— ॥
‘तब उन दोनोंने नारदजीसे कहा—‘भगवन्! ऐसे बात नहीं है। पहलेके कर्म-कर्ताओं (धर्म-व्यवस्थापकों)-ने यह उपदेश दिया है कि जो अपनेसे सभी बातोंमें बढ़ा-चढ़ा हो या अधिक शक्तिशाली हो, उसीको मार्ग देना चाहिए। हम दोनों एक-दूसरेसे मित्रभाव रखकर मिले हैं। विचार करनेपर हम यह निर्णय नहीं कर पाते कि हम दोनोंमेंसे कौन अत्यन्त श्रेष्ठ है और कौन उसकी अपेक्षा अधिक छोटा?’ उनके ऐसा कहनेपर नारदजीने तीन श्लोक पढ़े ।। ३ ।।
क्रूरः कौरव्य मृदवे
मृदुः क्रूरे च कौरव ।
साधुश्चासाधवे साधुः
साधवे नाप्नुयात् कथम् ।। ४ ।।
‘उनका सारांश इस प्रकार है—कौरव! अपने साथ कोमलताका बर्ताव करनेवालेके लिये क्रूर मनुष्य भी कोमल बन जाता है। क्रूरतापूर्ण बर्ताव तो वह क्रूर मनुष्योंके प्रति ही