महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1353, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरता है, परंतु साधु पुरुष दुष्टोंके प्रति भी साधुताका ही बर्ताव करता है। फिर वह साधु पुरुषोंके साथ साधुताका बर्ताव कैसे नहीं अपनायेगा? ।।
कृतं शतगुणं कुर्या-
न्नास्ति देवेषु निर्णयः ।
औशीनरः साधुशीलो
भवतो वै महीपतिः ।। ५ ।।
‘मनुष्य भी चाहे तो वह अपने ऊपर किये हुए उपकारका बदला सौगुना करके चुका सकता है। देवताओंमें ही यह प्रत्युपकारका भाव होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। सुहोत्र! उशीनरपुत्र शिबिका शील-स्वभाव तुमसे कहीं अच्छा है ।। ५ ।।
जयेत् कदर्यं दानेन
सत्येनानृतवादिनम् ।
क्षमया क्रूरकर्माण-
मसाधुं साधुना जयेत् ।। ६ ।।
‘नीच प्रकृतिवाले मनुष्यको दान देकर वशमें करे। असत्यवादीको सत्य भाषणसे जीते। क्रूरको क्षमासे और दुष्टको उत्तम व्यवहारसे अपने वशमें करे ।। ६ ।।
तदुभावेव भवन्तावुदारौ व इदानीं भवद्भ्यामन्य-तमः सोऽपसर्पतु एतद् वै निदर्शनमित्युक्त्वा तूष्णीं नारदो बभूव । एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यः शिबिं प्रदक्षिणं कृत्वा पन्थानं दत्त्वा बहुकर्मभिः प्रशस्य प्रययौ ।। ७ ।।
‘अतः तुम दोनों ही उदार हो; इस समय तुम दोनोंमें से एक, जो अधिक उदार हो, वह मार्ग छोड़कर हट जाय; यही उदारताका आदर्श है।' ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये। यह सुनकर कुरुवंशी राजा सुहोत्रने शिबिको अपनी दायीं ओर करके मार्ग दे दिया और उनके अनेक सत्कर्मोंका उल्लेख करके उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए वे अपनी राजधानीको चले गये ।। ७ ।।
तदेतद् राज्ञो महाभाग्यमप्युक्तवान् नारदः ।। ८ ।।
‘इस प्रकार साक्षात् नारदजीने राजा शिबिकी महत्ताका अपने मुखसे वर्णन किया’ ।। ८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि शिबिचरिते चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें शिबिचरितविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९४ ।।