महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा ययातिद्वारा ब्राह्मणको सहस्र गौओंका दान
मार्कण्डेय उवाच
इदमन्यच्छ्रूयतां ययातिर्नाहुषो राजा राज्यस्थः पौरजनावृत आसांचक्रे गुर्वर्थी ब्राह्मण उपेत्याब्रवीद् भो राजन् गुर्वर्थं भिक्षेयं समयादिति ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! अब एक-दूसरे क्षत्रिय नरेशका महत्त्व सुनो— नहुषके पुत्र राजा ययाति जब पुरवासी मनुष्योंसे घिरे हुए राजसिंहासन-पर विराजमान थे, उन्हीं दिनोंकी बात है, एक ब्राह्मण गुरु-दक्षिणा देनेके लिये भिक्षा माँगनेकी इच्छासे उनके पास आकर बोला—'राजन्! मैं गुरु-दक्षिणा देनेके लिये भिक्षा चाहता हूँ, किंतु उसके साथ एक शर्त है' ॥ १ ॥
राजोवाच
ब्रवीतु भगवान् समयमिति ॥ २ ॥
राजाने कहा— भगवन्! आप अपनी शर्त बताइये ॥ २ ॥
ब्राह्मण उवाच
विद्वेषणं परमं जीवलोके
कुर्यान्नरः पार्थिव याच्यमानः ।
तं त्वां पृच्छामि कथं तु राजन्
दद्याद् भवान् दयितं च मेऽद्य ॥ ३ ॥
ब्राह्मण बोला— भूपाल! इस संसारमें प्रायः देखा जाता है कि जब किसी मनुष्यसे कोई वस्तु माँगी जाती है, तब वह उस माँगनेवालेसे अत्यन्त द्वेष करने लगता है। अतः राजन्! मैं आपसे पूछता हूँ कि आज आप मुझे मेरी प्रिय वस्तु कैसे दे सकते हैं? ॥ ३ ॥
राजोवाच
न चानुकीर्तयेदद्य दत्त्वा
अयाच्यमर्थं न च संशृणोमि ।
प्राप्यमर्थं च संश्रुत्य
तं चापि दत्त्वा सुसुखी भवामि ॥ ४ ॥
राजाने कहा— दान लेनेके अधिकारी ब्राह्मणदेव! मैं कोई वस्तु देकर उसकी बार-बार चर्चा नहीं करता और यह प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो