भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1376

देवता और अतिथियोंको न देकर अकेले ही भोजन कर लेते हैं, उनका वह भोजन असत् कहा गया है। अतः उनका जन्म वृथा है (इस प्रकार इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ है) ॥ ४-५ ॥ आरूढपतिते दत्तमन्यायोपहृतं च यत् । व्यर्थं तु पतिते दानं ब्राह्मणे तस्करे तथा ॥ ६ ॥ जो वानप्रस्थ या संन्यास-आश्रमसे पुनः गृहस्थ-आश्रममें लौट आया हो, उसे 'आरूढ़-पतित' कहते हैं। उसको दिया हुआ दान व्यर्थ होता है। अन्यायसे कमाये हुए धनका दान भी व्यर्थ ही है। पतित ब्राह्मण तथा चोरको दिया हुआ दान भी व्यर्थ होता है ॥ ६ ॥ गुरौ चानृतिके पापे कृतघ्ने ग्रामयाजके । वेदविक्रयिणे दत्तं तथा वृषलयाजके ॥ ७ ॥ ब्रह्मबन्धुषु यद् दत्तं यद् दत्तं वृषलीपतौ । स्त्रीजनेषु च यद् दत्तं व्यालग्राहे तथैव च ॥ ८ ॥ परिचारकेषु यद् दत्तं वृथा दानानि षोडश । पिता आदि गुरुजन, मिथ्यावादी, पापी, कृतघ्न, ग्रामपुरोहित, वेदविक्रय करनेवाले, शूद्रसे यज्ञ करानेवाले, नीच ब्राह्मण, शूद्राके पति ब्राह्मण, साँपको पकड़कर व्यवसाय करनेवाले तथा सेवकों और स्त्री-समूहको दिया हुआ दान व्यर्थ है*। इस प्रकार ये सोलह दान निष्फल बताये गये हैं ॥ ७-८ १/२ ॥ तमोवृतस्तु यो दद्याद् भयात् क्रोधात् तथैव च ॥ ९ ॥ भुङ्क्ते च दानं तत् सर्वं गर्भस्थस्तु नरः सदा । ददद् दानं द्विजातिभ्यो वृद्धभावेन मानवः ॥ १० ॥ जो तमोगुणसे आवृत हो भय और क्रोधपूर्वक दान देता है, वह मनुष्य वैसे सब प्रकारके दानोंका फल भावी जन्ममें गर्भावस्थामें भोगता है, अर्थात् तामसी दान करनेके कारण वह उसका फल दुःखके रूपमें भोगता है तथा (श्रेष्ठ) ब्राह्मणोंको दान देनेवाला मानव उस दानका फल बड़ा होनेपर (कामनाके अनुसार) भोगता है ॥ ९-१० ॥ तस्मात् सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पार्थिव । दातव्यानि द्विजातिभ्यः स्वर्गमार्गजिगीषया ॥ ११ ॥ राजन्! इसीलिये मनुष्यको चाहिये कि वह स्वर्ग-मार्गपर अधिकार पानेकी इच्छासे सभी अवस्थाओंमें (श्रेष्ठ) ब्राह्मणोंको ही सब प्रकारके दान दे ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

चातुर्वर्ण्यस्य सर्वस्य वर्तमानाः प्रतिग्रहे । केन विप्रा विशेषेण तारयन्ति तरन्ति च ॥ १२ ॥