महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1377, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें**युधिष्ठिरने पूछा—**महामुने! जो ब्राह्मण चारों वर्णोंमेंसे सभीके दान ग्रहण करते हैं, वे किस विशेष धर्मका पालन करनेसे दूसरोंको तारते और स्वयं भी तरते हैं ॥ १२ ॥
मार्कण्डेय उवाच
जपैर्मन्त्रैश्च होमैश्च स्वाध्यायाध्ययनेन च । नावं वेदमयीं कृत्वा तारयन्ति तरन्ति च ॥ १३ ॥ **मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! ब्राह्मण जप, मन्त्र (पाठ), होम, स्वाध्याय और वेदाध्ययनके द्वारा वेदमयी नौकाका निर्माण करके दूसरोंको भी तारते हैं और स्वयं भी तर जाते हैं ॥ १३ ॥
ब्राह्मणांस्तोषयेद् यस्तु तुष्यन्ते तस्य देवताः । वचनाच्चापि विप्राणां स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ १४ ॥ जो ब्राह्मणोंको संतुष्ट करता है, उसपर सब देवता संतुष्ट रहते हैं। ब्राह्मणोंके वचनसे अर्थात् आशीर्वादसे भी मनुष्य स्वर्गलोक पा सकता है ॥ १४ ॥
पितृदैवतपूजाभिर्ब्राह्मणाभ्यर्चनेन च । अनन्तं पुण्यलोकं तु गन्तासि त्वं न संशयः ॥ १५ ॥ राजन्! तुम पितरों और देवताओंकी पूजासे तथा ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करनेसे अक्षय पुण्यलोकमें जाओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥
श्लेष्मादिभिर्व्याप्ततनुर्म्रियमाणो विचेतनः । ब्राह्मणा एव सम्पूज्याः पुण्यं स्वर्गमभीप्सता ॥ १६ ॥ जिसका शरीर कफ आदिसे भर गया हो, जो मर रहा हो और अचेत हो गया हो, उसे पुण्यमय स्वर्गलोककी प्राप्ति अभीष्ट हो तो ब्राह्मणोंकी पूजा भी करनी चाहिये ॥ १६ ॥
श्राद्धकाले तु यत्नेन भोक्तव्या ह्यजुगुप्सिताः । दुर्वर्णः कुनखी कुष्ठी मायावी कुण्डगोलकौ ॥ १७ ॥ वर्जनीयाः प्रयत्नेन काण्डपृष्ठाश्च देहिनः । जुगुप्सितं हि यच्छ्राद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ १८ ॥ श्राद्धकालमें प्रयत्न करके उत्तम ब्राह्मणोंको ही भोजन कराना चाहिये। जिनके शरीरका रंग घृणाजनक हो, नख काले पड़ गये हों, जो कोढ़ी और धूर्त हो, पिताकी जीवित-अवस्थामें ही माताके व्यभिचारसे जिनका जन्म हुआ हो अथवा जो विधवा माताके पेटसे पैदा हुए हों और जो पीठपर तरकस बाँधे क्षत्रियवृत्तिसे जीविका चलाते हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक त्याग दे; क्योंकि उनको भोजन करानेसे श्राद्ध निन्दित हो जाता है और निन्दित श्राद्ध यजमानको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे अग्नि काष्ठको जला डालती है ॥ १७-१८ ॥
ये ये श्राद्धे न युज्यन्ते मूकान्धबधिरादयः ।