भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1379

श्रोत्रियाय दरिद्राय गृहस्थायाग्निहोत्रिणे । पुत्रदाराभिभूताय तथा ह्यनुपकारिणे ॥ २७ ॥ दान लेनेवाला ब्राह्मण श्रोत्रिय हो, निर्धन हो, गृहस्थ हो, नित्य अग्निहोत्र करता हो, दरिद्रताके कारण जिसे स्त्री और पुत्रोंके तिरस्कार सहने पड़ते हों तथा दाताने न तो जिससे प्रत्युपकार प्राप्त किया हो और न आगे प्रत्युपकार प्राप्त होनेकी सम्भावना ही हो ॥ २७ ॥ एवंविधेषु दातव्या न समृद्धेषु भारत । को गुणो भरतश्रेष्ठ समृद्धेष्वभिवर्जितम् ॥ २८ ॥ भारत! ऐसे ही लोगोंको गोदान करना चाहिये, धनवानोंको नहीं। भरतश्रेष्ठ! धनवानोंको देनेसे क्या लाभ है? ॥ २८ ॥ एकस्यैका प्रदातव्या न बहूनां कदाचन । सा गौर्विक्रयमापन्ना हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम् ॥ २९ ॥ न तारयति दातारं ब्राह्मणं नैव नैव तु । एक गौ एक ही ब्राह्मणको देनी चाहिये; बहुतोंको कभी नहीं (क्योंकि एक ही गौ यदि बहुतोंको दी गयी, तो वे उसे बेचकर उसकी कीमत बाँट लेंगे)। दान की हुई गौ यदि बेच दी गयी, तो वह दाताकी तीन पीढ़ियोंको हानि पहुँचाती है। वह न तो दाताको ही पार उतारती है न ब्राह्मणको ही ॥ २९ १/२ ॥ सुवर्णस्य विशुद्धस्य सुवर्णं यः प्रयच्छति ॥ ३० ॥ सुवर्णानां शतं तेन दत्तं भवति शाश्वतम् । जो उत्तम वर्णवाले विशुद्ध ब्राह्मणको सुवर्ण-दान करता है उसे निरन्तर सौ स्वर्णमुद्राओंके दानका फल प्राप्त होता है ॥ ३० १/२ ॥ अनड्वाहं तु यो दद्याद् बलवन्तं धुरंधरम् ॥ ३१ ॥ स निस्तरति दुर्गाणि स्वर्गलोकं च गच्छति । जो लोग कंधेपर जुआ उठानेमें समर्थ बलवान् बैल ब्राह्मणोंको दान करते हैं, वे दुःख और संकटोंसे पार होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३१ १/२ ॥ वसुन्धरां तु यो दद्याद् द्विजाय विदुरात्मने ॥ ३२ ॥ दातारं ह्यनुगच्छन्ति सर्वे कामाभिवाञ्छिताः । जो विद्वान् ब्राह्मणको भूमिदान करता है, उस दाताके पास सभी मनोवाञ्छित भोग स्वतः आ जाते हैं ॥ ३२ १/२ ॥ पृच्छन्ति चात्र दातारं वदन्ति पुरुषा भुवि ॥ ३३ ॥ अध्वनि क्षीणगात्राश्च पांसुपादावगुण्ठिताः । तेषामेव श्रमार्तानां यो ह्यन्नं कथयेद् बुधः ॥ ३४ ॥ अन्नदातृसमः सोऽपि कीर्त्यते नात्र संशयः ।