भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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यदि कोई रास्तेके थके-माँदे, दुबले-पतले पथिक धूलभरे पैरोंसे भूखे-प्यासे आ जायँ और पूछें कि क्या यहाँ कोई भोजन देनेवाला है? उस समय उन्हें जो विद्वान् अन्न मिलनेका पता बता देता है, वह भी अन्नदाताके समान ही कहा जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ३३-३४ १/२॥

तस्मात् त्वं सर्वदानानि हित्वाऽन्नं सम्प्रयच्छ ह॥ ३५॥ न हीदृशं पुण्यफलं विचित्रमिह विद्यते। अतः युधिष्ठिर! तुम सारे दानोंको छोड़कर केवल अन्नदान करते रहो। इस संसारमें अन्नदानके समान विचित्र एवं पुण्यदायक दूसरा कोई दान नहीं है॥ ३५ १/२॥

यथाशक्ति च यो दद्यादन्नं विप्रेषु संस्कृतम्॥ ३६॥ स तेन कर्मणाऽऽप्नोति प्रजापतिसलोकताम्। जो अपनी शक्तिके अनुसार अच्छे ढंगसे तैयार किया हुआ भोजन ब्राह्मणोंको अर्पित करता है वह उस पुण्यकर्मके प्रभावसे प्रजापतिके लोकमें जाता है॥ ३६ १/२॥

अन्नमेव विशिष्टं हि तस्मात् परतरं न च॥ ३७॥ अन्नं प्रजापतिश्चोक्तः स च संवत्सरो मतः। संवत्सरस्तु यज्ञोऽसौ सर्वं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥ ३८॥ अतः अन्न ही सबसे महत्त्वकी वस्तु है। उससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। वेदोंमें अन्नको प्रजापति कहा गया है। प्रजापति संवत्सर माना गया है। संवत्सर यज्ञरूप है और यज्ञमें सबकी स्थिति है॥ ३७-३८॥

तस्मात् सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च। तस्मादन्नं विशिष्टं हि सर्वेभ्य इति विश्रुतम्॥ ३९॥ यज्ञसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। अतः अन्न ही सब पदार्थोंसे श्रेष्ठ है। यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है॥ ३९॥

येषां तटाकानि महोदकानि वाप्यश्च कूपाश्च प्रतिश्रयाश्च। अन्नस्य दानं मधुरा च वाणी यमस्य ते निर्वचना भवन्ति॥ ४०॥ जो लोग अगाध जलसे भरे हुए तालाब और पोखरे खुदवाते हैं, बावली, कुएँ तथा धर्मशालाएँ तैयार कराते हैं, अन्नका दान करते और मीठी बातें बोलते हैं, उन्हें यमराजकी बात भी नहीं सुननी पड़ती है अर्थात् यमराज उसे वचनमात्रसे भी दण्ड नहीं दे सकते॥ ४०॥

धान्यं श्रमेणार्जितवित्तसंचितं विप्रे सुशीले च प्रयच्छते यः। वसुन्धरा तस्य भवेत् सुतुष्टा