भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1381

धारां वसूनां प्रतिमुञ्चतीव ॥ ४१ ॥
जो अपने परिश्रमसे उपार्जित और संचित किया हुआ धन-धान्य सुशील ब्राह्मणको दान करता है, उसके ऊपर वसुधादेवी अत्यन्त संतुष्ट होती और उसके लिये धनकी धारा-सी बहाती हैं ॥ ४१ ॥
अन्नदाः प्रथमं यान्ति सत्यवाक् तदनन्तरम् ।
अयाचितप्रदाता च समं यान्ति त्रयो जनाः ॥ ४२ ॥
अन्न-दान करनेवाले पुरुष पहले स्वर्गमें प्रवेश करते हैं। उसके बाद सत्यवादी जाता है। फिर बिना माँगे ही दान करनेवाला पुरुष जाता है। इस प्रकार ये तीनों पुण्यात्मा मानव समान गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ४२ ॥

वैशम्पायन उवाच

कौतूहलसमुत्पन्नः पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ।
मार्कण्डेयं महात्मानं पुनरेव सहानुजः ॥ ४३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ और उन्होंने महात्मा मार्कण्डेयजीसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया—॥ ४३ ॥
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च ।
कीदृशं किम्प्रमाणं वा कथं वा तन्महामुने ।
तरन्ति पुरुषाश्चैव केनोपायेन शंस मे ॥ ४४ ॥
'महामुने! इस मनुष्यलोकसे यमलोक कितनी दूर है, कैसा है, कितना बड़ा है? और किस उपायसे मनुष्य वहाँके संकटोंसे पार हो सकते हैं? ये मुझे बतलाइये' ॥ ४४ ॥

मार्कण्डेय उवाच

सर्वगुह्यतमं प्रश्नं पवित्रमृषिसंस्तुतम् ।
कथयिष्यामि ते राजन् धर्म्यं धर्मभृतां वर ॥ ४५ ॥
**मार्कण्डेयजीने कहा—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुमने ऐसे विषयके लिये प्रश्न किया है, जो सबसे अधिक गोपनीय, पवित्र, धर्मसम्मत तथा ऋषियोंके लिये भी आदरणीय है। सुनो, मैं इस विषयका वर्णन करता हूँ ॥ ४५ ॥
षडशीतिसहस्राणि योजनानां नराधिप ।
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च ॥ ४६ ॥
महाराज! मनुष्यलोक और यमलोकके मार्गमें छियासी हजार योजनोंका अन्तर है ॥ ४६ ॥
आकाशं तदपानीयं घोरं कान्तारदर्शनम् ।
न तत्र वृक्षच्छाया वा पानीयं केतनानि च ॥ ४७ ॥