महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1382, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंविश्रमेद् यत्र वै श्रान्तः पुरुषोऽध्वनि कर्शितः।
उसके मार्गमें जलरहित शून्य आकाशमात्र है। वह देखनेमें बड़ा भयानक और दुर्गम है। वहाँ न तो वृक्षोंकी छाया है, न पानी है और न कोई ऐसा स्थान ही है जहाँ रास्तेका थका-माँदा जीव क्षणभर भी विश्राम कर सके॥ ४७१/२॥
नीयते यमदूतैस्तु यमस्याज्ञाकरैर्बलात् ॥ ४८ ॥
नराः स्त्रियस्तथैवान्ये पृथिव्यां जीवसंज्ञिताः।
यमराजकी आज्ञाका पालन करनेवाले यमदूत इस पृथ्वीपर आकर यहाँके पुरुषों, स्त्रियों तथा अन्य जीवोंको बलपूर्वक पकड़ ले जाते हैं॥ ४८१/२॥
ब्राह्मणेभ्यः प्रदानानि नानारूपाणि पार्थिव ॥ ४९ ॥
हयादीनां प्रकृष्टानि तेऽध्वानं यान्ति वै नराः।
संनिवार्यातपं यान्ति छत्रेणैव हि छत्रदाः ॥ ५० ॥
राजन्! जिनके द्वारा यहाँ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके अश्व आदि वाहनोंका उत्कृष्ट दान किया गया है, वे उस मार्गपर (उन्हीं वाहनोंद्वारा सुखसे) यात्रा करते हैं। छत्र-दान करनेवाले मनुष्य वहाँ प्राप्त हुए छत्रके द्वारा ही धूपका निवारण करते हुए चलते हैं॥ ४९-५०॥
तृप्ताश्चैवान्नदातारो ह्यतृप्ताश्चाप्यनन्नदाः।
वस्त्रिणो वस्त्रदा यान्ति अवस्त्रा यान्त्यवस्त्रदाः ॥ ५१ ॥
अन्न-दान करनेवाले जीव वहाँ भोजनसे तृप्त होकर यात्रा करते हैं; किंतु जिन्होंने अन्नदान नहीं किया है वे भूखका कष्ट सहते हुए चलते हैं। वस्त्र देनेवाले लोग कपड़े पहनकर जाते हैं और जिन्होंने वस्त्रदान नहीं किया है, उन्हें नंगे होकर जाना पड़ता है॥ ५१॥
हिरण्यदाः सुखं यान्ति पुरुषास्त्वभ्यलंकृताः।
भूमिदास्तु सुखं यान्ति सर्वैः कामैः सुतर्पिताः ॥ ५२ ॥
सुवर्णका दान करनेवाले मनुष्य उस मार्गपर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो बड़े सुखसे यात्रा करते हैं। भूमिको दान करनेवाले दाता सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे तृप्त हो वहाँ बड़े आनन्दसे जाते हैं॥ ५२॥
यान्ति चैवापरिक्लिष्टा नसः सस्यप्रदायकाः।
नराः सुखतरं यान्ति विमानेषु गृहप्रदाः ॥ ५३ ॥
खेतमें लगी हुई खेती दान करनेवाले मनुष्य बिना किसी कष्टके जाते हैं। गृहदान करनेवाले मानव विमानोंपर बैठकर अत्यन्त सुख-सुविधाके साथ जाते हैं॥ ५३॥
पानीयदा ह्यतृषिताः प्रहृष्टमनसो नराः।
पन्थानं द्योतयन्तश्च यान्ति दीपप्रदाः सुखम् ॥ ५४ ॥
जिन्होंने जल-दान किया है, उन्हें प्यासका कष्ट नहीं भोगना पड़ता, वे लोग प्रसन्नचित्त होकर वहाँ जाते हैं। दीपदान करनेवाले मनुष्य उस मार्गको प्रकाशित करते हुए सुखसे