भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1383

यात्रा करते हैं ॥ ५४ ॥
गोप्रदास्तु सुखं यान्ति निर्मुक्ताः सर्वपातकैः ।
विमानैर्हंससंयुक्तैर्यान्ति मासोपवासिनः ॥ ५५ ॥
गोदान करनेवाले मनुष्य सब पापोंसे मुक्ता हो सुखपूर्वक जाते हैं। एक मासतक उपवास-व्रत करनेवाले लोग हंसजुते हुए विमानोंद्वारा यात्रा करते हैं ॥ ५५ ॥
तथा बर्हिप्रयुक्तैश्च षष्ठरात्रोपवासिनः ।
त्रिरात्रं क्षपते यस्तु एकभक्तेन पाण्डव ॥ ५६ ॥
अन्तरा चैव नाश्नाति तस्य लोका ह्यनामयाः ।
जो लोग छठी राततक उपवास करते हैं, वे मोर जुते हुए विमानोंद्वारा जाते हैं। पाण्डुनन्दन! जो लोग एक बार भोजन करके उसीपर तीन रात काट ले जाते हैं और बीचमें भोजन नहीं करते, उन्हें रोग-शोकसे रहित पुण्यलोक प्राप्त होते हैं ॥ ५६ १/२ ॥
पानीयस्य गुणा दिव्याः प्रेतलोकसुखावहाः ॥ ५७ ॥
तत्र पुष्योदका नाम नदी तेषां विधीयते ।
शीतलं सलिलं तत्र पिबन्ति ह्यमृतोपमम् ॥ ५८ ॥
जलदान करनेका प्रभाव अत्यन्त अलौकिक है। वह परलोकमें सुख पहुँचानेवाला है। जो जलदान करते हैं उन पुण्यात्माओंके लिये उस मार्गमें पुष्योदका नामवाली नदी प्राप्त होती है। वे उसका शीतल और अमृतके समान मधुर जल पीते हैं ॥ ५७-५८ ॥
ये च दुष्कृतकर्माणः पूयं तेषां विधीयते ।
एवं नदी महाराज सर्वकामप्रदा हि सा ॥ ५९ ॥
महाराज! इस प्रकार वह नदी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है; किंतु जो पापी जीव हैं उनके लिये उस नदीका जल पीब बन जाता है ॥ ५९ ॥
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनान् यथाविधि ।
अध्वनि क्षीणगात्रश्च पथि पांसुसमन्वितः ॥ ६० ॥
पृच्छते ह्यन्नदातारं गृहमायाति चाशया ।
तं पूजयथ यत्नेन सोऽतिथिर्ब्राह्मणश्च सः ॥ ६१ ॥
अतः राजेन्द्र! तुम भी इन ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन करो। जो रास्ता चलनेसे थककर दुबला हो गया है, जिसका शरीर धूलसे भरा है और जो अन्नदाताका पता पूछता हुआ भोजनकी आशासे घरपर आ जाता है, उसका तुम यत्नपूर्वक सत्कार करो; क्योंकि वह अतिथि है, इसलिये ब्राह्मण ही है। अर्थात् ब्राह्मणके ही तुल्य है ॥
तं यान्तमनुगच्छन्ति देवाः सर्वे सवासवाः ।
तस्मिन् सम्पूजिते प्रीता निराशा यान्त्यपूजिते ॥ ६२ ॥
ऐसा अतिथि जब किसीके घरपर जाता है तब उसके पीछे इन्द्रादि सम्पूर्ण देवता भी वहाँतक जाते हैं। यदि वहाँ उस अतिथिका आदर होता है तो वे देवता भी प्रसन्न होते हैं