भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1385, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1385

अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद् योन्यां प्रदश्यते ।
तावत् गौ पृथिवी ज्ञेया यावद् गर्भं न मुञ्चति ॥ ७० ॥
जबतक बछड़ा योनिसे निकलते समय आकाशमें ही लटकता दिखायी दे, जबतक गाय अपने बछड़ेको पूर्णतःयोनिसे अलग न कर दे, तबतक उस गौको पृथ्वीरूप ही समझना चाहिये ॥ ७० ॥
यावन्ति तस्या रोमाणि वत्सस्य च युधिष्ठिर ।
तावद् युगसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ७१ ॥
युधिष्ठिर! उसका दान करनेसे उस गौ तथा बछड़ेके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने हजार युगोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ७१ ॥
सुवर्णनासां यः कृत्वा सुखुरां कृष्णधेनुकाम् ।
तिलैः प्रच्छादितां दद्यात् सर्वरत्नैरलंकृताम् ॥ ७२ ॥
प्रतिग्रहं गृहीत्वा यः पुनर्ददति साधवे ।
फलानां फलमश्नाति तदा दत्त्वा च भारत ॥ ७३ ॥
भारत! जो सोनेकी नाक और सुन्दर चाँदीके खुरोंसे विभूषित, सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत, काली गौको तिलोंसे प्रच्छादित करके उसका दान करता है और जो उस दानको लेकर पुनः किसी दूसरे श्रेष्ठ पुरुषको अर्पित कर देता है, वह सर्वोत्तम फलका भागी होता है ॥ ७२-७३ ॥
ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना ।
चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशयः ॥ ७४ ॥
उस गौके दानसे समुद्र, गुफा, पर्वत, वन और काननोंसहित चारों दिशाओंकी भूमिके दानका पुण्य प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ७४ ॥
अन्तर्जानुशयो यस्तु भुङ्क्ते संसक्तभाजनः ।
यो द्विजः शब्दरहितं स क्षमस्तारणाय वै ॥ ७५ ॥
जो द्विज अपने हाथोंको घुटनोंके भीतर किये मौनभावसे पात्रमें एक हाथ लगाये रखकर भोजन करता है, वह अपनेको और दूसरोंको तारनेमें समर्थ होता है ॥ ७५ ॥
अपानपा न गदितास्तथान्ये ये द्विजातयः ।
जपन्ति संहितां सम्यक् ते नित्यं तारणक्षमाः ॥ ७६ ॥
जो मदिरा नहीं पीते, जिनपर किसी प्रकारका दोष नहीं लगाया गया है तथा जो अन्य द्विज विधिपूर्वक वेदोंकी संहिताका पाठ करते हैं, वे सदा दूसरोंको तारनेमें समर्थ होते हैं ॥ ७६ ॥
हव्यं कव्यं च यत् किंचित् सर्वं तच्छ्रोत्रियोऽर्हति ।
दत्तं हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलितेऽग्नौ यथा हुतम् ॥ ७७ ॥

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