भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1386

हव्य (यज्ञ) और कव्य (श्राद्ध)-की जितनी भी वस्तुएँ हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण उन सबको पानेका अधिकारी है। श्रेष्ठ श्रोत्रियको दिया हुआ दान उतना ही सफल होता है, जैसे प्रज्वलित अग्निमें दी हुई आहुति ।। ७७ ।। मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रयोधिनः । निहन्युर्मन्युना विप्रा वज्रपाणिरिवासुरान् ।। ७८ ।। ब्राह्मणोंका क्रोध ही अस्त्र-शस्त्र है। ब्राह्मण लोहेके हथियारोंसे नहीं लड़ा करते हैं। जैसे हाथमें वज्र लिये हुए इन्द्र असुरोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण क्रोधसे ही अपराधीको नष्ट कर देते हैं ।। ७८ ।। धर्माश्रितेयं तु कथा कथितेयं तवानघ । या श्रुत्वा मुनयः प्रीता नैमिषारण्यवासिनः ।। ७९ ।। निष्पाप युधिष्ठिर! यह मैंने धर्मयुक्त कथा कही है। इसे सुनकर नैमिषारण्यनिवासी मुनि बड़े प्रसन्न हुए थे ।। ७९ ।। वीतशोकभयक्रोधा विपाप्मानस्तथैव च । श्रुत्वेमां तु कथां राजन् न भवन्तीह मानवाः ।। ८० ।। राजन्! इस कथाको सुनकर मनुष्य शोक, भय, क्रोध और पापसे रहित हो फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते हैं ।। ८० ।।

युधिष्ठिर उवाच

किं तच्छौचं भवेद् येन विप्रः शुद्धः सदा भवेद् । तदिच्छामि महाप्राज्ञ श्रोतुं धर्मभृतां वर ।। ८१ ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाप्राज्ञ महर्ष! वह शौच क्या है जिससे ब्राह्मण सदा शुद्ध बना रहता है? मैं उसे सुनना चाहता हूँ ।। ८१ ।।

मार्कण्डेय उवाच

वाक्शौचं कर्मशौचं च यच्च शौचं जलात्मकम् । त्रिभिः शौचैरुपैतो यः स स्वर्गी नात्र संशयः ।। ८२ ।। **मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! शौच तीन प्रकारका होता है—वाक्शौच (वाणीकी पवित्रता), कर्मशौच (क्रियाकी पवित्रता) तथा जलशौच (जलसे शरीरकी शुद्धि)। जो इस तीन प्रकारके शौचसे सम्पन्न है, वह स्वर्गलोकका अधिकारी है, इसमें संशय नहीं ।। ८२ ।। सायं प्रातश्च संध्यां यो ब्राह्मणोऽभ्युपसेवते । प्रजपन् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् ।। ८३ ।। स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो नष्टकिल्बिषः । न सीदेत् प्रतिगृह्णानो महीमपि ससागराम् ।। ८४ ।।