भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1389

ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम् ॥ ९९ ॥ जो मन, वाणी, क्रिया और बुद्धिके द्वारा कभी पाप नहीं करते हैं, वे ही महात्मा तपस्वी हैं। शरीरको सुखा देना ही तपस्या नहीं है ॥ ९९ ॥

न ज्ञातिभ्यो दया यस्य शुक्लदेहोऽविकल्मषः । हिंसा सा तपसस्तस्य नानाशित्वं तपः स्मृतम् ॥ १०० ॥ जिसने व्रत, उपवास आदिके द्वारा शरीरको तो शुद्ध कर लिया और जो नाना प्रकारके पापकर्म भी नहीं करता, किंतु जिसके मनमें अपने कुटुम्बी जनोंके प्रति दया नहीं आती, उसकी वह निर्दयता उसके तपका नाश करनेवाली है; केवल भोजन छोड़ देनेका ही नाम तपस्या नहीं है ॥ १०० ॥

तिष्ठन् गृहे चैव मुनिर्नित्यं शुचिरलंकृतः । यावज्जीवं दयावांश्च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १०१ ॥ जो निरन्तर घरपर रहकर भी पवित्रभावसे रहता है, सद्गुणोंसे विभूषित होता है और जीवनभर सब प्राणियोंपर दया रखता है, उसे मुनि ही समझना चाहिये; वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १०१ ॥

न हि पापानि कर्माणि शुद्ध्यन्त्यनशनादिभिः । सीदत्यनशनादेव मांसशोणितलेपनः ॥ १०२ ॥ भोजन छोड़ने आदिसे पापकर्मोंका शोधन हो जाता हो, ऐसी बात नहीं है। हाँ, भोजन त्याग देनेसे यह रक्त-मांससे लिपा हुआ शरीर अवश्य क्षीण हो जाता है ॥

अज्ञातं कर्म कृत्वा च क्लेशो नान्यत् प्रहीयते । नाग्निर्दहति कर्माणि भावशून्यस्य देहिनः ॥ १०३ ॥ शास्त्रोंद्वारा जिनका विधान नहीं किया गया है, ऐसे कार्य करनेसे केवल क्लेश ही हाथ लगता है, उनसे पाप नष्ट नहीं किये जा सकते। अग्निहोत्र आदि शुभ कर्म भावशून्य अर्थात् श्रद्धारहित मनुष्यके पापकर्मोंको दग्ध नहीं कर सकते ॥ १०३ ॥

पुण्यादेव प्रव्रजन्ति शुद्ध्यन्त्यनशनानि च । न मूलफलभक्षित्वान्न मौनान्नानिलाशनात् ॥ १०४ ॥ शिरसो मुण्डनाद् वापि न स्थानकुटिकासनात् । न जटाधारणाद् वापि न तु स्थण्डिलशय्यया ॥ १०५ ॥ नित्यं ह्यनशनाद् वापि नाग्निशुश्रूषणादपि । न चोदकप्रवेशेन न च क्ष्माशयनादपि ॥ १०६ ॥ मनुष्य पुण्यके प्रभावसे ही उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। उपवास भी पुण्यसे अर्थात् निष्कामभावसे ही शुद्धिका कारण होता है। (बिना शुद्धभावके) केवल फल-मूल खाने, मौन रहने, हवा पीने, सिर मुँड़ाने, एक स्थानपर कुटी बनाकर रहने, सिरपर जटा रखने, वेदीपर