महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1390, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोने, नित्य उपवास, अग्निसेवन, जलप्रवेश तथा भूमिशयन करनेसे भी शुद्धि नहीं होती है॥ १०४—१०६॥
ज्ञानेन कर्मणा वापि जरामरणमेव च।
व्याधयश्च प्रहीयन्ते प्राप्यते चोत्तमं पदम्॥ १०७॥
तत्त्वज्ञान या सत्कर्मसे ही जरा, मृत्यु तथा रोगोंका नाश होता है और उत्तम पद (मुक्ति)-की प्राप्ति होती है॥ १०७॥
बीजानि ह्यग्निदग्धानि न रोहन्ति पुनर्यथा।
ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संयुज्यते पुनः॥ १०८॥
जैसे आगमें जले हुए बीज फिर नहीं उगते हैं, उसी प्रकार ज्ञानके द्वारा अविद्या आदि क्लेशोंके नष्ट हो जानेपर आत्माका पुनः उनसे संयोग नहीं होता॥ १०८॥
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्योपमानि च।
विनश्यन्ति न संदेहः फेनानीव महार्णवे॥ १०९॥
जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर सारे शरीर काठ और दीवारकी भाँति जडवत् होकर महासागरमें उठे हुए फेनोंकी तरह नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है॥
आत्मानं विन्दते येन सर्वभूतगुहाशयम्।
श्लोकेन यदि वार्धेन क्षीणं तस्य प्रयोजनम्॥ ११०॥
एक या आधे श्लोकसे भी यदि सम्पूर्ण भूतोंके हृदयदेशमें शयन करनेवाले परमात्माका ज्ञान हो जाय, तो उसके लिये सम्पूर्ण शास्त्रोंके अध्ययनका प्रयोजन समाप्त हो जाता है॥ ११०॥
द्व्यक्षरादभिसंधाय केचिच्छ्लोकपदाङ्कितैः।
शतैरन्यैः सहस्रैश्च प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्॥ १११॥
कोई ‘तत्त्वम्’ अथवा राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि दो अक्षरोंसे ही परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। कोई श्लोक और पदोंसे अंकित अन्य सैकड़ों तथा सहस्रों शास्त्रवाक्योंसे परमात्माके स्वरूपको जानते हैं। जैसे भी हो, बोध ही मोक्षका लक्षण है॥ १११॥
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।
ऊचुर्ज्ञानविदो वृद्धाः प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्॥ ११२॥
जिसके मनमें संशय भरा हुआ है, उसके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है। ‘ज्ञान ही मोक्षका लक्षण है’—यह वृद्ध, ज्ञानी पुरुषोंका कथन है॥ ११२॥
विदितार्थस्तु वेदानां परिवेद प्रयोजनम्।
उद्विजेत् स तु वेदेभ्यो दावाग्नेरिव मानवः॥ ११३॥
जब मनुष्य वेदोंके वास्तविक प्रयोजनको जान जाता है, तब वह वेदवेत्ता मानव (कर्मविधायक) समस्त वेदोंसे उसी प्रकार उपरत हो जाता है, जैसे मनुष्य दावानलसे हट