भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1391

जाते हैं ॥ ११३ ॥

शुष्कं तर्कं परित्यज्य आश्रयस्व श्रुतिं स्मृतिम् ।
एकाक्षराभिसम्बद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि ।
बुद्धिर्न तस्य सिद्धयेत साधनस्य विपर्ययात् ॥ ११४ ॥
प्रणवसे सम्बन्ध रखनेवाले परमात्मतत्त्वको यदि तुम युक्तिपूर्वक अर्थात् निःसंदेहभावसे समझना चाहते हो तो कोरा तर्कवाद छोड़कर श्रुति तथा स्मृतिके वचनोंका आश्रय लो। क्योंकि जो उपर्युक्त साधनका आश्रय नहीं लेता उसकी बुद्धि तत्त्वका निश्चय करनेमें समर्थ नहीं हो सकती ॥ ११४ ॥

वेदपूर्वं वेदितव्यं प्रयत्नात्
तत् वै वेदस्तस्य वेदः शरीरम् ।
वेदस्तत्त्वं तत्समासोपलब्धौ
क्लीबस्तवात्मा तत् स वेद्यस्य वेद्यम् ॥ ११५ ॥
इसलिये जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान वेदोंके द्वारा ही यत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि वह परमात्मतत्त्व वेदस्वरूप है। वेद उसका शरीर है। उस परमात्मतत्त्वको सहजभावसे प्राप्त करानेमें वेद हेतु है। यह जीवात्मा स्वयं समर्थ नहीं है; क्योंकि वह तत्त्व वेद्यका भी वेद्य है, अर्थात् जाननेमें बड़ा ही गहन है ॥

वेदोक्तमायुर्देवानामाशिषश्चैव कर्मणाम् ।
फलत्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम् ॥ ११६ ॥
देवताओंकी आयु और कर्मोंका शुभाशुभ फल आदि बातें वेदमें कही गयी हैं। उसके अनुसार ही देहधारियोंका प्रभाव संसारमें प्रत्येक युगमें फलित होता है ॥ ११६ ॥

इन्द्रियाणां प्रसादेन तदेतत् परिवर्जयेत् ।
तस्मादनशनं दिव्यं निरुद्धेन्द्रियगोचरम् ॥ ११७ ॥
अतः मनुष्यको इन्द्रियोंकी शुद्धिके द्वारा इन विषयभोगोंको त्याग देना चाहिये। यह इन्द्रियोंकी निर्मलता और निरोधसे होनेवाला अनशन (विषयोंका अग्रहण) दिव्य होता है ॥ ११७ ॥

तपसा स्वर्गगमनं भोगो दानेन जायते ।
ज्ञानेन मोक्षो विज्ञेयस्तीर्थस्नानादघक्षयः ॥ ११८ ॥
तपसे स्वर्गलोकमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है। दानसे भोगोंकी प्राप्ति होती है। ज्ञानसे मोक्ष मिलता है, यह जानना चाहिये तथा तीर्थस्नानसे पापोंका क्षय हो जाता है ॥ ११८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु राजेन्द्र प्रत्युवाच महायशाः ।