महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तङ्क उवाच
त्वया देव प्रजाः सर्वाः ससुरासुरमानवाः ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ १४ ॥
**उत्तङ्क बोले—**देव! देवता, असुर, मनुष्य आदि सारी प्रजा आपसे ही उत्पन्न हुई है। समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंकी सृष्टि भी आपने ही की है ॥ १४ ॥
ब्रह्म वेदाश्च वेद्यं च त्वया सृष्टं महाद्युते ।
शिरस्ते गगनं देव नेत्रे शशिदिवाकरौ ॥ १५ ॥
निःश्वासः पवनश्चापि तेजोऽग्निश्च तवाच्युत ।
बाहवस्ते दिशः सर्वाः कुक्षिश्चापि महार्णवः ॥ १६ ॥
ऊरू ते पर्वता देव खं नाभिर्मधुसूदन ।
पादौ ते पृथिवी देवी रोमाण्याोषधयस्तथा ॥ १७ ॥
महातेजस्वी परमेश्वर! ब्रह्मा, वेद और जाननेयोग्य सभी वस्तुएँ आपने ही उत्पन्न की हैं। देव! आकाश आपका मस्तक है। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। वायु श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है। अच्युत! सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ और महासागर आपका कुक्षिस्थान है। देव! मधुसूदन! पर्वत आपके ऊरु और अन्तरिक्ष-लोक आपकी नाभि है। पृथ्वीदेवी आपके चरण तथा ओषधियाँ रोएँ हैं ॥ १५—१७ ॥
इन्द्रसोमाग्निवरुणा देवासुरमहोरगाः ।