भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1398, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1398

प्रह्वास्त्वामुपतिष्ठन्ति स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः ॥ १८ ॥
भगवन्! इन्द्र, सोम, अग्नि, वरुण देवता, असुर और बड़े-बड़े नाग—ये सब आपके सामने नतमस्तक हो नाना प्रकारके स्तोत्र पढ़कर आपकी स्तुति करते हुए आपको हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं ॥ १८ ॥

त्वया व्याप्तानि सर्वाणि भूतानि भुवनेश्वर ।
योगिनः सुमहावीर्याः स्तुवन्ति त्वां महर्षयः ॥ १९ ॥
भुवनेश्वर! आपने सम्पूर्ण भूतोंको व्याप्त कर रखा है। महान् शक्तिशाली योगी और महर्षि आपका स्तवन करते हैं ॥ १९ ॥

त्वयि तुष्टे जगत् स्वास्थ्यं त्वयि क्रुद्धे महत् भयम् ।
भयानामपनेतासि त्वमेकः पुरुषोत्तम ॥ २० ॥
पुरुषोत्तम! आपके संतुष्ट होनेपर ही संसार स्वस्थ एवं सुखी होता है और आपके कुपित होनेपर इसे महान् भयका सामना करना पड़ता है। एकमात्र आप ही सम्पूर्ण भयका निवारण करनेवाले हैं ॥ २० ॥

देवानां मानुषाणां च सर्वभूतसुखावहः ।
त्रिभिर्विक्रमणैर्देव त्रयो लोकास्त्वया हृताः ॥ २१ ॥
देव! आप देवताओं, मनुष्यों तथा सम्पूर्ण भूतोंको सुख पहुँचानेवाले हैं। आपने तीन पगोंद्वारा ही (बलिके हाथसे) तीनों लोक (दानद्वारा) हरण कर लिये थे ॥ २१ ॥

असुराणां समृद्धानां विनाशश्च त्वया कृतः ।
तव विक्रमणैर्देव निर्वाणमगमन् परम् ॥ २२ ॥
आपने समृद्धिशाली असुरोंका संहार किया है। आपके ही पराक्रमसे देवता परम सुख-शान्तिके भागी हुए हैं ॥ २२ ॥

पराभूताश्च दैत्येन्द्रास्त्वयि क्रुद्धे महाद्युते ।
त्वं हि कर्ता विकर्ता च भूतानामिह सर्वशः ॥ २३ ॥
आराधयित्वा त्वां देवाः सुखमेधन्ति सर्वशः ।
महाद्युते! आपके रुष्ट होनेसे ही दैत्यराज देवताओंके सामने पराजित हो जाते हैं। आप इस जगत्‌के सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। प्रभो! आपकी आराधना करके ही सम्पूर्ण देवता सुख एवं समृद्धि-लाभ करते हैं ॥ २३ १/२ ॥

एवं स्तुतो हृषीकेश उत्तङ्केन महात्मना ॥ २४ ॥
उत्तङ्कमब्रवीद् विष्णुः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु ।
महात्मा उत्तङ्कके इस प्रकार स्तुति करनेपर सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक भगवान् विष्णुने उनसे कहा—‘सहर्ष! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो’ ॥ २४ १/२ ॥

उत्तङ्क उवाच

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