महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपर्याप्तो मे वरो ह्येष यदहं दृष्टवान् हरिम् ॥ २५ ॥ पुरुषं शाश्वतं दिव्यं स्रष्टारं जगतः प्रभुम् । उत्तङ्कने कहा— भगवन्! समस्त संसारकी सृष्टि करनेवाले दिव्य सनातन पुरुष आप सर्वशक्तिमान् श्रीहरिका जो मुझे दर्शन मिला, यही मेरे लिये सबसे महान् वर है ॥ २५ १/२ ॥
विष्णुरुवाच
प्रीतस्तेऽहमलौल्येन भक्त्या तव च सत्तम ॥ २६ ॥ अवश्यं हि त्वया ब्रह्मन् मत्तो ग्राह्यो वरो द्विज । भगवान् विष्णु बोले— सज्जनशिरोमणे! मैं तुम्हारी लोभशून्यता एवं उत्तम भक्तिसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। ब्रह्मन्! तुम्हें मुझसे कोई वर अवश्य लेना चाहिये ॥ २६ १/२ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवं स छन्द्यमानस्तु वरेण हरिणा तदा ॥ २७ ॥ उत्तङ्कः प्राञ्जलिर्वव्रे वरं भरतसत्तम । मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान् विष्णुके द्वारा वर लेनेके लिये आग्रह होनेपर उत्तङ्कने हाथ जोड़कर इस प्रकार वर माँगा ॥ २७ १/२ ॥ यदि मे भगवन् प्रीतः पुण्डरीकनिभेक्षण ॥ २८ ॥ धर्मे सत्ये दमे चैव बुद्धिर्भवतु मे सदा । अभ्यासश्च भवेद् भक्त्या त्वयि नित्यं ममेश्वर ॥ २९ ॥ ‘भगवन्! कमलनयन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रहमें लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजनका मेरा अभ्यास सदा बना रहे’ ॥ २८-२९ ॥
श्रीभगवानुवाच
सर्वमेतद्धि भविता मत्प्रसादात् तव द्विज । प्रतिभास्यति योगश्च येन युक्तो दिवौकसाम् ॥ ३० ॥ त्रयाणामपि लोकानां महत् कार्यं करिष्यसि । श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन्! मेरी कृपासे यह सब कुछ तुम्हें प्राप्त हो जायगा। इसके सिवा तुम्हारे हृदयमें उस योगविद्याका प्रकाश होगा जिससे युक्त होकर तुम देवताओं तथा तीनों लोकोंका महान् कार्य सिद्ध कर सकोगे ॥ ३० १/२ ॥ उत्सादनार्थं लोकानां धुन्धुर्नाम महासुरः ॥ ३१ ॥ तपस्यति तपो घोरं शृणु यस्तं हनिष्यति ।