महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1404, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंममाश्रमसमीपे वै समेषु मरुधन्वसु । समुद्रो बालुकापूर्ण उज्वालक इति स्मृतः ॥ १६ ॥ मेरे आश्रमके समीप समस्त मरुप्रदेशमें एक बालूसे पूर्ण अर्थात् बालुकामय समुद्र है, उसका नाम है उज्वालक ॥ १६ ॥ बहुयोजनविस्तीर्णो बहुयोजनमायतः । तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रमः ॥ १७ ॥ मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुणः । अन्तर्भूमिगतो राजन् वसत्यमितविक्रमः ॥ १८ ॥ उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनकी है। वहाँ महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न एक भयंकर दानवराज रहता है, जो मधु और कैटभका पुत्र है। वह क्रूर स्वभाववाला राक्षस धुन्धु नामसे प्रसिद्ध है। राजन्! वह अमित पराक्रमी दानव धरतीके भीतर छिपकर रहा करता है ॥ १७-१८ ॥ तं निहत्य महाराज वनं त्वं गन्तुमर्हसि । शेते लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम् ॥ १९ ॥ त्रिदशानां विनाशाय लोकानां चापि पार्थिव । महाराज! उसका नाश करके ही आपको वनमें जाना चाहिये। भूपाल! वह सम्पूर्ण लोकों और देवताओंके विनाशके लिये कठोर तपस्याका आश्रय लेकर (पृथ्वीमें) शयन करता है ॥ १९ १/२ ॥ अवध्यो दैवतानां हि दैत्यानामथ रक्षसाम् ॥ २० ॥ नागानामथ यक्षाणां गन्धर्वाणां च सर्वशः । अवाप्य स वरं राजन् सर्वलोकपितामहात् ॥ २१ ॥ राजन्! वह सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीसे वर पाकर देवताओं, दैत्यों, राक्षसों, नागों, यक्षों और समस्त गन्धर्वोंके लिये अवध्य हो गया है ॥ २०-२१ ॥ तं विनाशय भद्रं ते मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा । प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं शाश्वतीमव्ययां ध्रुवाम् ॥ २२ ॥ महाराज! आपका कल्याण हो। आप उस दैत्यका विनाश कीजिये। इसके विपरीत आपको कोई विचार नहीं करना चाहिये। उसका वध करके आप सदा बनी रहनेवाली अक्षय एवं महान् कीर्ति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥ क्रूरस्य तस्य स्वपतो बालुकान्तर्हितस्य च । संवत्सरस्य पर्यन्ते निःश्वासः सम्प्रवर्तते ॥ २३ ॥ बालूके भीतर छिपकर रहनेवाला वह क्रूर राक्षस एक वर्षमें एक ही बार साँस लेता है ॥ २३ ॥ यदा तदा भूश्चलति सशैलवनकानना ।