भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1405

तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत् ।। २४ ।। आदित्यपथमाश्रित्य सप्ताहं भूमिकम्पनम् । सविस्फुलिङ्गं सज्ज्वलं धूममिश्रं सुदारुणम् ।। २५ ।। जिस समय वह साँस लेता है, उस समय पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी डोलने लगती है। उसके साँसकी आँधीसे धूलका इतना ऊँचा बवंडर उठता है कि वह सूर्यके मार्गको भी ढक लेता है और सात दिनोंतक वहाँ भूकम्प होता रहता है। आगकी चिनगारियाँ, ज्वालाएँ और धूआँ उठकर अत्यन्त भयंकर दृश्य उपस्थित करते हैं ।। २४-२५ ।। तेन राजन् न शक्नोमि तस्मिन् स्थातुं स्व आश्रमे । तं विनाशय राजेन्द्र लोकानां हितकाम्यया ।। २६ ।। राजन्! इस कारण मेरा अपने आश्रममें रहना कठिन हो गया है। महाराज! सब लोगोंके हितके लिये आप उस राक्षसको नष्ट कीजिये ।। २६ ।। लोकाः स्वस्था भविष्यन्ति तस्मिन् विनिहतेऽसुरे । त्वं हि तस्य विनाशाय पर्याप्त इति मे मतिः ।। २७ ।। उस असुरके मारे जानेपर सब लोग स्वस्थ एवं सुखी हो जायँगे। मेरा विश्वास है कि आप अकेले ही उसका नाश करनेके लिये पर्याप्त हैं ।। २७ ।। तेजसा तव तेजश्च विष्णुराप्याययिष्यति । विष्णुना च वरो दत्तः पूर्वं मम महीपते ।। २८ ।। यस्तं महासुरं रौद्रं वधिष्यति महीपतिः । तेजस्तं वैष्णवमिति प्रवेक्ष्यति दुरासदम् ।। २९ ।। भूपाल! भगवान् विष्णु अपने तेजसे आपके तेजको बढ़ायेंगे। उन्होंने पूर्वकालमें मुझे यह वर दिया था कि जो राजा उस भयानक एवं महान् असुरका वध करनेको उद्यत होगा, उस दुर्धर्ष वीरके भीतर मेरा वैष्णव तेज प्रवेश करेगा ।। २८-२९ ।। तत् तेजस्त्वं समाधाय राजेन्द्र भुवि दुःसहम् । तं निष्षूदय राजेन्द्र दैत्यं रौद्रपराक्रमम् ।। ३० ।। महाराज! अतः आप भगवान्‌का दुःसह तेज धारण करके पृथ्वीपर रहनेवाले उस भयानक पराक्रमी दैत्यको नष्ट कीजिये ।। ३० ।। न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते । निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ।। ३१ ।। राजन्! धुन्धु महातेजस्वी असुर है। साधारण तेजसे सौ वर्षोंमें भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सकता ।। ३१ ।।