महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1412, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद् ब्रवीह्यविचारयन् ।। २५ ।।
‘सुरश्रेष्ठ! हम दोनों तुम्हें वर देते हैं। देव! तुम्हीं हमलोगोंसे वर माँगो। हम दोनों तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार वर देंगे। तुम बिना सोचे-विचारे जो चाहो, माँग लो’ ।। २५ ।।
श्रीभगवानुवाच
प्रतिगृह्णे वरं वीरावीप्सितश्च वरो मम ।
युवां हि वीर्यसम्पन्नौ न वामस्ति समः पुमान् ।। २६ ।।
**श्रीभगवान् बोले—**वीरो! मैं तुमसे अवश्य वर लूँगा। मुझे तुमसे वर प्राप्त करना अभीष्ट है; क्योंकि तुम दोनों बड़े पराक्रमी हो। तुम्हारे-जैसा दूसरा कोई पुरुष नहीं है ।। २६ ।।
वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ ।
एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय वै ।। २७ ।।
सत्यपराक्रमी वीरो! तुम दोनों मेरे हाथसे मारे जाओ। मैं सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये तुमसे यही मनोरथ प्राप्त करना चाहता हूँ ।। २७ ।।
मधुकैटभावूचतुः
अनृतं नोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्ध्यावां पुरुषोत्तम ।। २८ ।।
**मधु और कैटभने कहा—**पुरुषोत्तम! हमलोगोंने पहले कभी स्वच्छन्द (मर्यादारहित) बर्तावमें भी झूठ नहीं कहा है, फिर और समयमें तो हम झूठ बोल ही कैसे सकते हैं? आप हम दोनोंको सत्य और धर्ममें अनुरक्त मानिये ।। २८ ।।
बले रूपे च शौर्ये च न शमे च समोऽस्ति नौ ।
धर्मे तपसि दाने च शीलसत्त्वदमेषु च ।। २९ ।।
बल, रूप, शौर्य और मनोनिग्रहमें हमारी समता करनेवाला कोई नहीं है। धर्म, तपस्या, दान, शील, सत्त्व तथा इन्द्रियसंयममें भी हमारी कहीं तुलना नहीं है ।। २९ ।।
उपप्लवो महानस्मानुपावर्तत केशव ।
उक्तं प्रतिकुरुष्व त्वं कालो हि दुरतिक्रमः ।। ३० ।।
किंतु केशव! हमलोगोंपर यह महान् संकट आ पहुँचा है। अब आप भी अपनी कही हुई बात पूर्ण कीजिये। कालका उल्लंघन करना बहुत ही कठिन है ।।
आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वया विभो ।
अनावृतेऽस्मिन्नाकाशे वधं सुरवरोत्तम ।। ३१ ।।
देव! सुरश्रेष्ठ! विभो! हम दोनों आपके द्वारा एक ही सुविधा चाहते हैं। वह यह है कि आप इस खुले आकाशमें ही हमारा वध कीजिये ।। ३१ ।।
पुत्रत्वमधिगच्छाव तव चापि सुलोचन ।