भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1413, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1413

वर एष वृतो देव तद् विद्धि सुरसत्तम ॥ ३२ ॥
अनृतं मा भवेद् देव यद्धि नौ संश्रुतं तदा ।
सुन्दर नेत्रोंवाले देवेश्वर! हम दोनों आपके पुत्र हों। हमने आपसे यही वर माँगा है। आप इसे अच्छी तरह समझ लें। सुरश्रेष्ठ देव! हमने जो प्रतिज्ञा की है, वह असत्य नहीं होनी चाहिये ॥ ३२ १/२ ॥

श्रीभगवानुवाच
बाढमेवं करिष्यामि सर्वमेतद् भविष्यति ॥ ३३ ॥
श्रीभगवान् बोले— बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। यह सब कुछ (तुम्हारी इच्छाके अनुसार) होगा ॥ ३३ ॥
स विचिन्त्याथ गोविन्दो नापश्यद् यदनावृतम् ।
अवकाशं पृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ॥ ३४ ॥
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा ।
मधुकैटभयो राजन् शिरसी मधुसूदनः ।
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महायशाः ॥ ३५ ॥
भगवान् विष्णुने बहुत सोचनेपर जब कहीं खुला आकाश न देखा और स्वर्ग अथवा पृथ्वीपर भी जब उन्हें कोई खुली जगह न दिखायी दी, तब महायशस्वी देवेश्वर मधुसूदनने अपनी दोनों जाँघोंको अनावृत (वस्त्ररहित) देखकर मधु और कैटभके मस्तकोंको उन्हींपर रखकर तीखी धारवाले चक्रसे काट डाला ॥ ३४-३५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०३ ॥

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