भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः

धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना

मार्कण्डेय उवाच

धुन्धुर्नाम महाराज तयोः पुत्रो महाद्युतिः ।
स तपोऽतप्यत महन्महावीर्यपराक्रमः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— महाराज! उन्हीं दोनों मधु और कैटभका पुत्र धुन्धु है जो बड़ा तेजस्वी और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है। उसने बड़ी भारी तपस्या की ॥ १ ॥
अतिष्ठदेकपादेन कृशो धमनिसंततः ।
तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो वरं वव्रे स च प्रभुम् ॥ २ ॥
वह दीर्घकालतक एक पैरसे खड़ा रहा। उसका शरीर इतना दुर्बल हो गया कि नस-नाड़ियोंका जाल दिखायी देने लगा। ब्रह्माजीने उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर उसे वर दिया। धुन्धुने भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार वर माँगा— ॥ २ ॥
देवदानवयक्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम् ।
अवध्योऽहं भवेयं वै वर एष वृतो मया ॥ ३ ॥
'भगवन्! मैं देवता, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस किसीके हाथसे न मारा जाऊँ। मैंने आपसे यही वर माँगा है' ॥ ३ ॥
एवं भवतु गच्छेति तमुवाच पितामहः ।
स एवमुक्तस्तत्पादौ मूर्ध्ना स्पृश्य जगाम ह ॥ ४ ॥
तब ब्रह्माजीने उससे कहा—'ऐसा ही होगा। जाओ।' उनके ऐसा कहनेपर धुन्धुने मस्तक झुकाकर उनके चरणोंका स्पर्श किया और वहाँसे चला गया ॥ ४ ॥
स तु धुन्धुर्वरं लब्ध्वा महावीर्यपराक्रमः ।
अनुस्मरन् पितृवधं द्रुतं विष्णुमुपागमत् ॥ ५ ॥
जब धुन्धु वर पाकर महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हो गया, तब उसे अपने पिता मधु और कैटभके वधका स्मरण हो आया और वह शीघ्रतापूर्वक भगवान् विष्णुके पास गया ॥ ५ ॥
स तु देवान् सगन्धर्वान् जित्वा धुन्धुरमर्षणः ।
बबाध सर्वानसकृद् विष्णुं देवांश्च वै भृशम् ॥ ६ ॥
धुन्धु अमर्षमें भरा हुआ था। उसने गन्धर्व-सहित सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर भगवान् विष्णु तथा अन्य देवताओंको बार-बार महान् कष्ट देना प्रारम्भ किया ॥ ६ ॥