भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1416

दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवाः समन्तात् पर्यवारयन् । देवदुन्दुभयश्चापि नेदुः स्वयमनीरिताः ॥ १५ ॥ देवतालोग चारों ओरसे उनपर दिव्य फूलोंकी वर्षा करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ स्वयं बिना किसी प्रेरणाके बज उठीं ॥ १५ ॥ शीतश्च वायुः प्रववौ प्रयाणे तस्य धीमतः । विपांसुलां महीं कुर्वन् ववर्ष च सुरेश्वरः ॥ १६ ॥ उन बुद्धिमान् राजा कुवलाश्वके यात्राकालमें शीतल वायु चलने लगी। देवराज इन्द्र धरतीकी धूल शान्त करनेके लिये वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥ अन्तरिक्षे विमानादि देवतानां युधिष्ठिर । तत्रैव समदृश्यन्त धुन्धुर्यत्र महासुरः ॥ १७ ॥ युधिष्ठिर! जहाँ महान् असुर 'धुन्धु' रहता था, वहीं आकाशमें देवताओंके विमान आदि दिखायी देने लगे ॥ कुवलाश्वस्य धुन्धोश्च युद्धकौतूहलान्विताः । देवगन्धर्वसहिताः समवैक्षन् महर्षयः ॥ १८ ॥