महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1417, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुवलाश्व और धुन्धुका युद्ध देखनेके लिये उत्सुक हो देवताओं और गन्धर्वोंके साथ महर्षि भी आकर डट गये और वहाँकी सारी बातोंपर दृष्टिपात करने लगे ॥ १८ ॥ नारायणेन कौरव्य तेजसाऽऽप्यायितस्तदा । स गतो नृपतिः क्षिप्रं पुत्रैस्तैः सर्वतो दिशम् ॥ १९ ॥ अर्णवं खानयामास कुवलाश्वो महीपतिः । कुरुनन्दन! उस समय भगवान् नारायणके तेजसे परिपुष्ट हो राजा कुवलाश्व अपने उन पुत्रोंके साथ वहाँ जा पहुँचे और शीघ्र ही चारों ओरसे उस बालुकामय समुद्रको खुदवाने लगे ॥ १९ १/२ ॥ कुवलाश्वस्य पुत्रैश्च तस्मिन् वै बालुकार्णवे ॥ २० ॥ सप्तभिर्दिवसैः खात्वा दृष्टो धुन्धुर्महाबलः । कुवलाश्वके पुत्रोंने सात दिनोंतक खुदाई करनेके बाद उस बालुकामय समुद्रमें (छिपे हुए) महाबली धुन्धुको देखा ॥ २० १/२ ॥ आसीद् घोरं वपुस्तस्य बालुकान्तर्हितं महत् ॥ २१ ॥ दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ । बालूके भीतर छिपा हुआ उसका शरीर विशाल एवं भयंकर था। भरतश्रेष्ठ! वह अपने तेजसे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहा था ॥ २१ १/२ ॥ ततो धुन्धुर्महाराज दिशमावृत्य पश्चिमाम् ॥ २२ ॥ सुप्तोऽभूद् राजशार्दूल कालानलसमद्युतिः । महाराज! तदनन्तर धुन्धु पश्चिम दिशाको घेरकर सो गया। नृपश्रेष्ठ! उसकी कान्ति प्रलयकालीन अग्निके समान जान पड़ती थी ॥ २२ १/२ ॥ कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु सर्वतः परिवारितः ॥ २३ ॥ अभिद्रुतः शरैस्तीक्ष्णैर्गदाभिर्मुसलैरपि । पट्टिशैः परिघैः प्रासैः खड्गैश्च विमलैः शितैः ॥ २४ ॥ स वध्यमानः संक्रुद्धः समुत्तस्थौ महाबलः । क्रुद्धश्चाभक्षयत् तेषां शस्त्राणि विविधानि च ॥ २५ ॥ उस समय राजा कुवलाश्वके पुत्रोंने सब ओरसे घेरकर उसपर आक्रमण किया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धारवाले खड्ग—इन सबके द्वारा चोट खाकर महाबली धुन्धु क्रोधित हो गया और उनके चलाये हुए नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको वह क्रोधी असुर खा गया ॥ २३—२५ ॥ आस्याद् वमन् पावकं स संवर्तकसमं तदा । तान् सर्वान् नृपतेः पुत्रानदहत् स्वेन तेजसा ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् उसने अपने मुँहसे प्रलयकालीन अग्निके समान आगकी चिनगारियाँ उगलना आरम्भ किया और उन समस्त राजकुमारोंको अपने तेजसे जलाकर भस्म कर