महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1418, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिया ।। २६ ।।
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्धर्तयन्निव ।
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः ।। २७ ।।
सगरस्यात्मजान् क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
नृपश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् कपिलने कुपित होकर राजा सगरके सभी पुत्रोंको
क्षणभरमें दग्ध कर दिया था, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धुन्धुने, मानो वह सम्पूर्ण लोकोंको
नष्ट कर देना चाहता हो, अपने मुखसे आग प्रकट करके कुवलाश्वके पुत्रोंको जला दिया।
यह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई ।। २७ १/२ ।।
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम ।। २८ ।।
तं प्रबुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम् ।
आससाद महातेजाः कुवलाश्वो महीपतिः ।। २९ ।।
भरतश्रेष्ठ! जब सभी राजकुमार धुन्धुकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये, तब महातेजस्वी
राजा कुवलाश्वने दूसरे कुम्भकर्णके* समान जगे हुए उस महाकाय दानवपर आक्रमण
किया ।। २८-२९ ।।
तस्य वारि महाराज सुस्राव बहु देहतः ।
तदापीय ततस्तेजो राजा वारिमयं नृप ।। ३० ।।
योगी योगेन वह्निं च शमयामास वारिणा ।
महाराज! उस समय धुन्धुके शरीरसे बहुत-सा जल प्रवाहित होने लगा, किंतु राजा
कुवलाश्वने योगी होनेके कारण योगबलसे उस जलमय तेजको पी लिया और जल प्रकट
करके धुन्धुकी मुखाग्निको बुझा दिया ।। ३० १/२ ।।
ब्रह्मास्त्रेण च राजेन्द्र दैत्यं क्रूरपराक्रमम् ।। ३१ ।।
ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकभवाय वै ।
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् ।। ३२ ।।
सुरशत्रुममित्रघ्नं त्रैलोक्येश इवापरः ।
राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणके लिये राजर्षि कुवलाश्वने
ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धुको दग्ध कर दिया। इस प्रकार
ब्रह्मास्त्रद्वारा शत्रुनाशक, देववैरी महान् असुर धुन्धुको दग्ध करके राजा कुवलाश्व दूसरे
इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे ।। ३१-३२ १/२ ।।
धुन्धोर्वधात् तदा राजा कुवलाश्वो महामनाः ।। ३३ ।।
धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्नाप्रतिरथोऽभवत् ।
उस समय महामना राजा कुवलाश्व धुन्धुको मारनेके कारण 'धुन्धुमार' नामसे विख्यात
हो गये। उनका सामना करनेवाला वीर कोई नहीं रह गया था ।। ३३ १/२ ।।