भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1419, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1419

प्रीतैश्च त्रिदशैः सर्वैर्महर्षिसहितैस्तदा ॥ ३४ ॥
वरं वृणीष्वेत्युक्तः स प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा ।
अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥

तदनन्तर महर्षियोंसहित सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होकर वहाँ आये और राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजन्! उनकी बात सुनकर कुवलाश्व अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर इस प्रकार बोले— ॥ ३४-३५ ॥
दद्यां वित्तं द्विजाग्र्येभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जयः ।
सख्यं च विष्णुना मे स्याद् भूतेष्वद्रोह एव च ॥ ३६ ॥

‘देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करूँ, शत्रुओंके लिये दुर्जय बना रहूँ, भगवान् विष्णुके साथ सख्य भावसे मेरा प्रेम हो और किसी भी प्राणीके प्रति मेरे मनमें द्रोह न रह जाय ॥ ३६ ॥
धर्मे रतिश्च सततं स्वर्गे वासस्तथाक्षयः ।
तथास्त्विति ततो देवैः प्रीतैरुक्तः स पार्थिवः ॥ ३७ ॥

‘धर्ममें मेरा सदा अनुराग हो और अन्तमें मेरा स्वर्गलोकमें नित्य निवास हो।' यह सुनकर देवताओंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा कुवलाश्वसे कहा—'महाराज! ऐसा ही होगा' ॥ ३७ ॥
ऋषिभिश्च सगन्धर्वैरुत्तङ्केन च धीमता ।
सम्भाष्य चैनं विविधैराशीर्वादैस्ततो नृप ॥ ३८ ॥

राजन्! तदनन्तर ऋषियों, गन्धर्वों और बुद्धिमान् महर्षि उत्तंकने भी नाना प्रकारके आशीर्वाद देते हुए राजासे वार्तालाप किया ॥ ३८ ॥
देवा महर्षयश्चापि स्वानि स्थानानि भेजिरे ।
तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा युधिष्ठिर तदाभवन् ॥ ३९ ॥

युधिष्ठिर! इसके बाद देवता और महर्षि अपने-अपने स्थानको चले गये। उस युद्धमें राजा कुवलाश्वके तीन ही पुत्र शेष रह गये थे ॥ ३९ ॥
दृढाश्वः कपिलाश्वश्च चन्द्राश्वश्चैव भारत ।
तेभ्यः परम्परा राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ॥ ४० ॥
वंशस्य सुमहाभाग राज्ञाममिततेजसाम् ।

भारत! उनके नाम थे—दृढाश्व, कपिलाश्व और चन्द्राश्व। राजन्! महाभाग! उन्हींसे अमित तेजस्वी इक्ष्वाकुवंशी महामना नरेशोंकी वंश-परम्परा चालू हुई ॥
एवं स निहतस्तेन कुवलाश्वेन सत्तम ॥ ४१ ॥
धुन्धुर्नाम महादैत्यो मधुकैटभयोः सुतः ।
कुवलाश्वश्च नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः ॥ ४२ ॥

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