भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1466

**ब्राह्मण बोला—**धर्मव्याध! तुम धर्मके विषयमें बड़ी मधुर और प्रिय बातें कह रहे हो। इन बातोंको बतानेवाला दूसरा कोई नहीं है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम कोई दिव्य प्रभावसे सम्पन्न महान् ऋषि ही हो ॥ १३ ॥

व्याध उवाच

ब्राह्मणा वै महाभागाः पितरोऽग्रभुजः सदा ।
तेषां सर्वात्मना कार्यं प्रियं लोके मनीषिणा ॥ १४ ॥
**धर्मव्याधने कहा—**ब्रह्मन्! महाभाग ब्राह्मण और पितर ये सदा प्रथम भोजनके अधिकारी माने गये हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको इस लोकमें सब प्रकारसे उनका प्रिय करना चाहिये ॥ १४ ॥
यत् तेषां च प्रियं तत् ते वक्ष्यामि द्विजसत्तम ।
नमस्कृत्या ब्राह्मणेभ्यो बाह्मीं विद्यां निबोध मे ॥ १५ ॥
विप्रवर! उन ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके लिये जो प्रिय वस्तु है, उसका वर्णन करता हूँ। तुम मुझसे ब्राह्मी विद्या श्रवण करो ॥ १५ ॥
इदं विश्वं जगत् सर्वमजय्यं चापि सर्वशः ।
महाभूतात्मकं ब्रह्म नातः परतरं भवेत् ॥ १६ ॥
पञ्चमहाभूतोंसे बना हुआ यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सब प्रकारसे अजेय ब्रह्मस्वरूप है। ब्रह्मसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है ॥ १६ ॥
महाभूतानि खं वायुरग्निरापस्तथा च भूः ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः ॥ १७ ॥
आकाश, वायु अग्नि, जल तथा पृथिवी—ये पाँच महाभूत हैं तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये क्रमशः उनके विशेष गुण हैं ॥ १७ ॥
तेषामपि गुणाः सर्वे गुणवृत्तिः परस्परम् ।
पूर्वपूर्वगुणाः सर्वे क्रमश‍ो गुणिषु त्रिषु ॥ १८ ॥
उन शब्द आदि गुणोंके भी अनेक गुण-भेद हैं, क्योंकि इन गुणोंका परस्पर संक्रमण भी देखा जाता है। पहले-पहलेके सभी गुण क्रमशः बादवाले तीन गुणवान् भूतों (अग्नि, जल और पृथ्वी)-में उपलब्ध होते हैं, अर्थात् अग्निमें शब्द, स्पर्श और रूप; जलमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाये जाते हैं ॥ १८ ॥
षष्ठस्तु चेतना नाम मन इत्यभिधीयते ।
सप्तमी तु भवेद् बुद्धिरहंकारस्ततः परम् ॥ १९ ॥
इन पाँच भूतोंके अतिरिक्त छठा तत्त्व है चित्त; इसीको मन कहते हैं। सातवाँ तत्त्व बुद्धि है और उसके बाद आठवाँ अहंकार है ॥ १९ ॥
इन्द्रियाणि च पञ्चात्मा रजः सत्त्वं तमस्तथा ।