महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्रैव रमते बुद्धिस्ततः पापं चिकीर्षति । जो किसी बहानेसे धर्माचरण करता है, वह वास्तवमें धर्मकी आड़ लेकर धन चाहता है। द्विजश्रेष्ठ! जब धर्मके बहानेसे धनकी प्राप्ति होने लगती है, तब उसकी बुद्धि उसीमें रम जाती है और उसके मनमें पापकी इच्छा जाग उठती है ॥ ६ १/२ ॥
सुहृद्भिर्वार्यमाणश्च पण्डितैश्च द्विजोत्तम ॥ ७ ॥ उत्तरं श्रुतिसम्बद्धं ब्रवीत्यश्रुतियोजितम् । विप्रवर! जब उसे हितैषी मित्र तथा विद्वान् पुरुष ऐसा करनेसे रोकते हैं, तब वह उसके समर्थनमें अशास्त्रीय उत्तर देते हुए भी उसे वेद-प्रतिपादित बताता है ॥ ७ १/२ ॥
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्तते रागदोषजः ॥ ८ ॥ पापं चिन्तयते चैव ब्रवीति च करोति च । तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधवः ॥ ९ ॥ रागरूपी दोषके कारण उसके द्वारा तीन प्रकारके अधर्म होने लगते हैं—१. वह मनसे पापका चिन्तन करता है, २. वाणीसे पापकी ही बात बोलता है और ३. क्रियाद्वारा भी पापका ही आचरण करता है। इस प्रकार अधर्ममें लग जानेपर उसके सभी अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं ॥ ८-९ ॥
एकशीलैश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः । स तेन दुःखमाप्नोति परत्र च विपद्यते ॥ १० ॥ वह अपने ही-जैसे स्वभाववाले पापपरायण मनुष्योंसे मित्रता स्थापित कर लेता है। उस पापसे इस लोकमें तो दुःख होता ही है, परलोकमें भी उसे बड़ी विपत्ति भोगनी पड़ती है ॥ १० ॥
पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु । यस्त्वेतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥ ११ ॥ कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते । तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धर्मेषु राजते ॥ १२ ॥ इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है। अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो। जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है। अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है ॥ ११-१२ ॥
ब्राह्मण उवाच
ब्रवीषि सूनृतं धर्म्यं यस्य वक्ता न विद्यते । दिव्यप्रभावः सुमहानृषिरेव मतोऽसि मे ॥ १३ ॥