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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

तत्रैव रमते बुद्धिस्ततः पापं चिकीर्षति । जो किसी बहानेसे धर्माचरण करता है, वह वास्तवमें धर्मकी आड़ लेकर धन चाहता है। द्विजश्रेष्ठ! जब धर्मके बहानेसे धनकी प्राप्ति होने लगती है, तब उसकी बुद्धि उसीमें रम जाती है और उसके मनमें पापकी इच्छा जाग उठती है ॥ ६ १/२ ॥

सुहृद्भिर्वार्यमाणश्च पण्डितैश्च द्विजोत्तम ॥ ७ ॥ उत्तरं श्रुतिसम्बद्धं ब्रवीत्यश्रुतियोजितम् । विप्रवर! जब उसे हितैषी मित्र तथा विद्वान् पुरुष ऐसा करनेसे रोकते हैं, तब वह उसके समर्थनमें अशास्त्रीय उत्तर देते हुए भी उसे वेद-प्रतिपादित बताता है ॥ ७ १/२ ॥

अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्तते रागदोषजः ॥ ८ ॥ पापं चिन्तयते चैव ब्रवीति च करोति च । तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधवः ॥ ९ ॥ रागरूपी दोषके कारण उसके द्वारा तीन प्रकारके अधर्म होने लगते हैं—१. वह मनसे पापका चिन्तन करता है, २. वाणीसे पापकी ही बात बोलता है और ३. क्रियाद्वारा भी पापका ही आचरण करता है। इस प्रकार अधर्ममें लग जानेपर उसके सभी अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं ॥ ८-९ ॥

एकशीलैश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः । स तेन दुःखमाप्नोति परत्र च विपद्यते ॥ १० ॥ वह अपने ही-जैसे स्वभाववाले पापपरायण मनुष्योंसे मित्रता स्थापित कर लेता है। उस पापसे इस लोकमें तो दुःख होता ही है, परलोकमें भी उसे बड़ी विपत्ति भोगनी पड़ती है ॥ १० ॥

पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु । यस्त्वेतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥ ११ ॥ कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते । तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धर्मेषु राजते ॥ १२ ॥ इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है। अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो। जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है। अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है ॥ ११-१२ ॥

ब्राह्मण उवाच

ब्रवीषि सूनृतं धर्म्यं यस्य वक्ता न विद्यते । दिव्यप्रभावः सुमहानृषिरेव मतोऽसि मे ॥ १३ ॥

**ब्राह्मण बोला—**धर्मव्याध! तुम धर्मके विषयमें बड़ी मधुर और प्रिय बातें कह रहे हो। इन बातोंको बतानेवाला दूसरा कोई नहीं है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम कोई दिव्य प्रभावसे सम्पन्न महान् ऋषि ही हो ॥ १३ ॥

व्याध उवाच

ब्राह्मणा वै महाभागाः पितरोऽग्रभुजः सदा ।
तेषां सर्वात्मना कार्यं प्रियं लोके मनीषिणा ॥ १४ ॥
**धर्मव्याधने कहा—**ब्रह्मन्! महाभाग ब्राह्मण और पितर ये सदा प्रथम भोजनके अधिकारी माने गये हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको इस लोकमें सब प्रकारसे उनका प्रिय करना चाहिये ॥ १४ ॥
यत् तेषां च प्रियं तत् ते वक्ष्यामि द्विजसत्तम ।
नमस्कृत्या ब्राह्मणेभ्यो बाह्मीं विद्यां निबोध मे ॥ १५ ॥
विप्रवर! उन ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके लिये जो प्रिय वस्तु है, उसका वर्णन करता हूँ। तुम मुझसे ब्राह्मी विद्या श्रवण करो ॥ १५ ॥
इदं विश्वं जगत् सर्वमजय्यं चापि सर्वशः ।
महाभूतात्मकं ब्रह्म नातः परतरं भवेत् ॥ १६ ॥
पञ्चमहाभूतोंसे बना हुआ यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सब प्रकारसे अजेय ब्रह्मस्वरूप है। ब्रह्मसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है ॥ १६ ॥
महाभूतानि खं वायुरग्निरापस्तथा च भूः ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः ॥ १७ ॥
आकाश, वायु अग्नि, जल तथा पृथिवी—ये पाँच महाभूत हैं तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये क्रमशः उनके विशेष गुण हैं ॥ १७ ॥
तेषामपि गुणाः सर्वे गुणवृत्तिः परस्परम् ।
पूर्वपूर्वगुणाः सर्वे क्रमश‍ो गुणिषु त्रिषु ॥ १८ ॥
उन शब्द आदि गुणोंके भी अनेक गुण-भेद हैं, क्योंकि इन गुणोंका परस्पर संक्रमण भी देखा जाता है। पहले-पहलेके सभी गुण क्रमशः बादवाले तीन गुणवान् भूतों (अग्नि, जल और पृथ्वी)-में उपलब्ध होते हैं, अर्थात् अग्निमें शब्द, स्पर्श और रूप; जलमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाये जाते हैं ॥ १८ ॥
षष्ठस्तु चेतना नाम मन इत्यभिधीयते ।
सप्तमी तु भवेद् बुद्धिरहंकारस्ततः परम् ॥ १९ ॥
इन पाँच भूतोंके अतिरिक्त छठा तत्त्व है चित्त; इसीको मन कहते हैं। सातवाँ तत्त्व बुद्धि है और उसके बाद आठवाँ अहंकार है ॥ १९ ॥
इन्द्रियाणि च पञ्चात्मा रजः सत्त्वं तमस्तथा ।

इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः ॥ २० ॥
इनके सिवा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राण और सत्त्व, रज, तम—इन सत्रह तत्त्वोंका समूह अव्यक्त कहलाता है ॥ २० ॥
सर्वैरिहेन्द्रियार्थैस्तु व्यक्ताव्यक्तैः सुसंवृतैः ।
चतुर्विंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गुणः ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २१ ॥
पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा मन और बुद्धिके जो व्यक्त और अव्यक्त विषय हैं, जो बुद्धिरूपी गुहामें छिपे रहते हैं, उन्हें सम्मिलित करनेसे चौबीस तत्त्व होते हैं। इन तत्त्वोंका समुदाय ही व्यक्त और अव्यक्तरूप गुण है। (यह सब-का-सब ब्रह्मस्वरूप है।) ब्राह्मण! इस प्रकार ये सब बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये
दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१० ॥

पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन

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एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

एवमुक्तः स विप्रस्तु धर्मव्याधेन भारत ।
कथामकथयद् भूयो मनसः प्रीतिवर्धनीम् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**भरतनन्दन! धर्मव्याधके इस प्रकार उपदेश देनेपर कौशिक ब्राह्मणने पुनः मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली वार्ता प्रारम्भ की ॥ १ ॥

ब्राह्मण उवाच

महाभूतानि यान्याहुः पञ्च धर्मभृतां वर ।
एकैकस्य गुणान् सम्यक् पञ्चानामपि मे वद ॥ २ ॥
**ब्राह्मण बोला—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! जो पाँच महाभूत कहे जाते हैं, उन पाँचोंमेंसे प्रत्येकके गुणोंका मुझसे भलीभाँति वर्णन करो ॥ २ ॥

व्याध उवाच

भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वायुराकाशमेव च ।
गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां वक्ष्यामि ते गुणान् ॥ ३ ॥
**धर्मव्याधने कहा—**ब्रह्मन्! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये सब पूर्व-पूर्ववाले तत्त्व अपनेसे उत्तर-उत्तरवालोंके गुणोंसे युक्त हैं। मैं उनके गुणोंका वर्णन करता हूँ ॥ ३ ॥

भूमिः पञ्चगुणा ब्रह्मन्नुदकं च चतुर्गुणम् ।
गुणास्त्रयस्तेजसि च त्रयश्चाकाशवातयोः ॥ ४ ॥
विप्रवर! पृथ्वीमें पाँच गुण हैं, जल चार गुणोंसे युक्त है, तेजमें तीन गुण होते हैं, वायुमें दो और आकाशमें एक गुण है ॥ ४ ॥

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
एते गुणाः पञ्च भूमेः सर्वेभ्यो गुणवत्तरा ॥ ५ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये भूमिके पाँच गुण हैं। इस प्रकार भूमि अन्य सब भूतोंकी अपेक्षा अधिक गुणवती है ॥ ५ ॥

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि द्विजोत्तम ।
अपामेते गुणा ब्रह्मन् कीर्तितास्तव सुव्रत ॥ ६ ॥

द्विजश्रेष्ठ! शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चार जलके गुण हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण! इनका वर्णन पहले भी आपसे किया गया है ॥ ६ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रयः ।
शब्दः स्पर्शश्च वायौ तु शब्दश्चाकाश एव तु ॥ ७ ॥
शब्द, स्पर्श तथा रूप—ये तेजके तीन गुण हैं, शब्द और स्पर्श—ये दो गुण वायुके हैं तथा आकाशमें एक ही गुण है—शब्द ॥ ७ ॥
एते पञ्चदश ब्रह्मन् गुणा भूतेषु पञ्चसु ।
वर्तन्ते सर्वभूतेषु येषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ८ ॥
ब्रह्मन्! इस प्रकार पाँचों भूतोंमें ये पंद्रह गुण बताये गये हैं। इन्हींमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं ॥ ८ ॥
अन्योन्यं नातिवर्तन्ते सम्यक् च भवति द्विज ।
यदा तु विषमं भावमाचरन्ति चराचराः ॥ ९ ॥
तदा देही देहमन्यं व्यतिरोहति कालतः ।
आनुपूर्व्या विनश्यन्ति जायन्ते चानुपूर्वशः ॥ १० ॥
विप्रवर! ये पाँच भूत एक-दूसरेके बिना नहीं रह सकते। परस्पर मिलकर ही भलीभाँति प्रकाशित होते हैं। जिस समय व्यक्त और अव्यक्त पाँचों भूत विषम-भावको प्राप्त होते हैं, उस समय यह जीव कालकी प्रेरणासे अपने संकल्पानुसार दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है। ये पाँचों भूत मृत्युकालमें प्रतिलोमक्रमसे विलीन हो जाते हैं और उत्पत्तिकालमें अनुलोमक्रमसे उत्पन्न होते हैं ॥ ९-१० ॥
तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः ।
यैरावृतमिदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ११ ॥
विभिन्न शरीरोंमें जितने रक्त आदि धातु दिखायी देते हैं, वे सब पाँच भूतोंके ही परिणाम हैं, जिनसे यह समस्त चराचर जगत् व्याप्त है ॥ ११ ॥
इन्द्रियैः सृज्यते यद् यत् तत् तद् व्यक्तमिति स्मृतम् ।
तदव्यक्तमिति ज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ १२ ॥
बाह्य इन्द्रियोंसे जिस-जिसका संसर्ग होता है, वह-वह व्यक्त माना गया है; परंतु जो विषय इन्द्रियग्राह्य नहीं है, केवल अनुमानसे जाना जाता है, उसे अव्यक्त समझना चाहिये ॥ १२ ॥
यथास्वं ग्राहकाण्येषां शब्दादीनामिमानि तु ।
इन्द्रियाणि यदा देही धारयन्निव तप्यते ॥ १३ ॥
अपने-अपने विषयोंका अतिक्रमण न करके इन शब्द आदि विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन इन्द्रियोंको जब आत्मा अपने वशमें करता है, तब मानो वह तपस्या करता है ॥ १३ ॥

लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति । परावरज्ञो यः शक्तः स तु भूतानि पश्यति ॥ १४ ॥ वह सम्पूर्ण लोकोंमें अपनेको व्याप्त और अपनेमें सम्पूर्ण लोकोंको स्थित देखता है। इस प्रकार जो निर्गुण ब्रह्मको जाननेवाला समर्थ ज्ञानी पुरुष है, वह सम्पूर्ण भूतोंको आत्मरूपसे देखता है ॥ १४ ॥

पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा । ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते ॥ १५ ॥ सब अवस्थाओंमें सदा समस्त भूतोंको आत्मरूपसे देखनेवाले उस ब्रह्मस्वरूप ज्ञानीका कभी भी अशुभ कर्मोंसे सम्पर्क होना सम्भव नहीं है ॥ १५ ॥

अज्ञानमूलं तं क्लेशमतिवृत्तस्य पौरुषम् । लोकवृत्तिप्रकाशेन ज्ञानमार्गेण गम्यते ॥ १६ ॥ उस (पूर्वोक्त) अज्ञानजनित क्लेशसे जो पार हो गया है, उस महापुरुषका प्रभाव उसके द्वारा की जानेवाली लौकिक चेष्टाओंसे ज्ञानमार्गके द्वारा जाना जा सकता है ॥ १६ ॥

अनादिनिधनं जन्तुमात्मयोनिं सदाव्ययम् । अनौपम्यममूर्तं च भगवानाह बुद्धिमान् ॥ १७ ॥ बुद्धिमान् भगवान् ब्रह्माने (अपने निःश्वासभूत वेदोंके द्वारा) मुक्त जीवको आदि-अन्तसे रहित, स्वयम्भू, अविकारी, अनुपम तथा निराकार बताया है ॥ १७ ॥

तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां विप्रानुपृच्छसि । इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥ १८ ॥ विप्रवर! आप मुझसे जो कुछ पूछते हैं, उसके उत्तरमें मैं यह बता रहा हूँ कि इस सबका मूल तप है। इन्द्रियोंका संयम करनेसे ही वह तपस्या सम्पन्न होती है, और किसी प्रकारसे नहीं ॥ १८ ॥

इन्द्रियाण्येव तत् सर्वं यत् स्वर्गनरकावुभौ । निगृहीतविसृष्टानि स्वर्गाय नरकाय च ॥ १९ ॥ स्वर्ग और नरक आदि जो कुछ भी है, वह सब इन्द्रियाँ ही हैं, अर्थात् इन्द्रियाँ ही उनकी कारण हैं। वशमें की हुई इन्द्रियाँ स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली हैं और जिन्हें विषयोंकी ओर खुला छोड़ दिया गया है, वे इन्द्रियाँ नरकमें डालनेवाली हैं ॥ १९ ॥

एष योगविधिः कृत्स्नो यावदिन्द्रियधारणम् । एतन्मूलं हि तपसः कृत्स्नस्य नरकस्य च ॥ २० ॥ योगका सम्पूर्णरूपसे अनुष्ठान यही है कि मनसहित समस्त इन्द्रियोंको काबूमें रखा जाय। यही सारी तपस्याका मूल है, और इन्द्रियोंको वशमें न रखना ही नरकका हेतु है ॥

इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमार्च्छन्त्यसंशयम् । संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं समाप्नुयात् ॥ २१ ॥

इन्द्रियोंके संसर्गसे ही मनुष्य निःसंदेह दुर्गुण-दुराचार आदि दोषोंको प्राप्त होते हैं। उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी तरह वशमें कर लेनेपर उन्हें सर्वथा सिद्धि प्राप्त हो सकती है॥ २१॥

षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति ।
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥ २२ ॥
जो अपने शरीरमें ही सदा विद्यमान रहनेवाले मनसहित छहों इन्द्रियोंपर अधिकार पा लेता है वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंमें नहीं लगता। फिर पापजनित अनर्थोंसे तो उसका संयोग ही कैसे हो सकता है? ।।

रथः शरीरं पुरुषस्य दृष्ट-
मात्मा नियन्तेन्द्रियाण्याहुरश्वान् ।
तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै-
र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥ २३ ॥
पुरुषका यह प्रत्यक्ष देखनेमें आनेवाला स्थूल शरीर रथ है। आत्मा (बुद्धि) सारथि है और इन्द्रियोंको अश्व बताया गया है। जैसे कुशल, सावधान एवं धीर रथी उत्तम घोड़ोंको अपने वशमें रखकर उनके द्वारा सुखपूर्वक मार्ग तै करता है, उसी प्रकार सावधान, धीर एवं साधन-कुशल पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करके सुखसे जीवन-यात्रा पूर्ण करता है॥ २३॥

षण्णामात्मनि युक्तानामिन्द्रियाणां प्रमाथिनाम् ।
यो धीरो धारयेद् रश्मीन् स स्यात् परमसारथिः ॥ २४ ॥
जो धीर पुरुष अपने शरीरमें नित्य विद्यमान छः प्रमथनशील इन्द्रियरूपी अश्वोंकी बागडोर सँभालता है, वही उत्तम सारथि हो सकता है॥ २४॥

इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु ।
धृतिं कुर्वीत सारथ्ये धृत्या तानि जयेद् ध्रुवम् ॥ २५ ॥
सड़कपर दौड़नेवाले घोड़ोंकी तरह विषयोंमें विचरनेवाली इन इन्द्रियोंको वशमें करनेके लिये धैर्यपूर्वक प्रयत्न करे। धैर्यपूर्वक उद्योग करनेवालेको उनपर अवश्य विजय प्राप्त होती है॥ २५॥

इन्द्रियाणां विचरतां यन्मनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरते बुद्धिं नावं वायुरिवाम्भसि ॥ २६ ॥
जैसे जलमें चलनेवाली नावको वायु हर लेती है, वैसे ही विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे मन जिस इन्द्रियके साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुषकी बुद्धिको हर लेती है॥ २६॥

येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात् फलागमम् ।
तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ॥ २७ ॥

सभी मनुष्य इन छः इन्द्रियोंके शब्द आदि विषयोंमें उनसे प्राप्त होनेवाले सुखरूप फल पानेके सम्बन्धमें मोहसे संशयमें पड़ जाते हैं। परंतु जो उनके दोषोंका अनुसंधान करनेवाला वीतराग पुरुष है, वह उनका निग्रह करके ध्यानजनित आनन्दका अनुभव करता है ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २११ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २११ ॥

तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

एवं तु सूक्ष्मे कथिते धर्मव्याधेन भारत ।
ब्राह्मणः स पुनः सूक्ष्मं पप्रच्छ सुसमाहितः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भारत! इस प्रकार धर्मव्याधके द्वारा सूक्ष्म तत्त्वका निरूपण होनेपर कौशिक ब्राह्मणने एकाग्रचित्त होकर पुनः एक सूक्ष्म प्रश्न उपस्थित किया ॥ १ ॥

ब्राह्मण उवाच

सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम् ।
गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छतः ॥ २ ॥
ब्राह्मण बोला— व्याध! मैं यहाँ यथोचितरूपसे एक प्रश्न उपस्थित करता हूँ। वह यह है कि सत्त्व, रज और तमका गुण (स्वरूप) क्या है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताओ ॥ २ ॥

व्याध उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
एषां गुणान् पृथक्त्वेन निबोध गदतो मम ॥ ३ ॥
धर्मव्याधने कहा— ब्रह्मन्! आप मुझसे जो बात पूछ रहे हैं, मैं अब उसे कहूँगा। सत्त्व, रज और तम—इन तीनोंके गुणोंका पृथक्-पृथक् वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥ ३ ॥
मोहात्मकं तमस्तेषां रज एषां प्रवर्तकम् ।
प्रकाशबहुत्वाच्च सत्त्वं ज्याय इहोच्यते ॥ ४ ॥
इन तीनों गुणोंमें जो तमोगुण है वह मोहात्मक—मोह उत्पन्न करनेवाला है। रजोगुण कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला है। परंतु सत्त्वगुणमें प्रकाशकी बहुलता है, इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ ४ ॥
अविद्याबहुलो मूढः स्वप्नशीलो विचेतनः ।
दुर्हृषीकस्तमोध्वस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ॥ ५ ॥
जिसमें अज्ञानकी बहुलता है, जो मूढ़ (मोहग्रस्त) और अचेत होकर सदा नींद लेता रहता है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें न होनेके कारण दूषित हैं, जो अविवेकी, क्रोधी और आलसी है, ऐसे मनुष्यको तमोगुणी जानना चाहिये ॥ ५ ॥
प्रवृत्तवाक्यो मन्त्री च यो नराग्र्योऽनसूयकः ।
विधित्समानो विप्रर्षे स्तब्धो मानी स राजसः ॥ ६ ॥

ब्रह्मर्षे! जो प्रवृत्तिमार्गकी ही बातें करनेवाला, सलाह देनेमें कुशल और दूसरोंके गुणोंमें दोष न देखनेवाला है; जो सदा कुछ-न-कुछ करनेकी इच्छा रखता है, जिसमें कठोरता और अभिमानकी अधिकता है, वह मनुष्योंपर रोब जमानेवाला पुरुष रजोगुणी कहा गया है ॥ ६ ॥

प्रकाशबहुलो धीरो निर्विधित्सोऽनसूयकः ।
अक्रोधनो नरो धीमान् दान्तश्चैव स सात्त्विकः ॥ ७ ॥
जिसमें प्रकाश (ज्ञान)-की बहुलता है, जो धीर और नये-नये कार्य आरम्भ करनेकी उत्सुकतासे रहित है, जिसमें दूसरोंके दोष देखनेकी प्रवृत्तिका अभाव है जो क्रोधशून्य, बुद्धिमान् और जितेन्द्रिय है, वह मनुष्य सात्त्विक माना जाता है ॥ ७ ॥

सात्त्विकस्त्वथ सम्बुद्धो लोकवृत्तेन क्लिश्यते ।
यदा बुध्यति बोद्धव्यं लोकवृत्तं जुगुप्सते ॥ ८ ॥
सात्त्विक पुरुष ज्ञानसम्पन्न हो रजोगुण और तमोगुणके कार्यभूत लौकिक व्यवहारमें पड़नेका कष्ट नहीं उठाता। वह जब जाननेयोग्य तत्त्वको जान लेता है, तब उसे सांसारिक व्यवहारसे ग्लानि हो जाती है ॥ ८ ॥

वैराग्यस्य च रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते ।
मृदुर्भवत्यहङ्कारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ॥ ९ ॥
सात्त्विक पुरुषमें वैराग्यका लक्षण पहले ही प्रकट हो जाता है। उसका अहंकार ढीला पड़ जाता है और सरलता प्रकाशमें आने लगती है ॥ ९ ॥

ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम् ।
न चास्य संशयो नाम क्वचिद् भवति कश्चन ॥ १० ॥
तदनन्तर इसके राग-द्वेष आदि सम्पूर्ण द्वन्द्व परस्पर शान्त हो जाते हैं। इसके हृदयमें कभी कोई संशय नहीं उठता ॥ १० ॥

शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः ।
वैश्यत्वं लभते ब्रह्मन् क्षत्रियत्वं तथैव च ॥ ११ ॥
ब्रह्मन्! शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्य भी यदि उत्तम गुणोंका आश्रय ले, तो वह वैश्य तथा क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यमभिजायते ।
गुणास्ते कीर्तिताः सर्वे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
जो 'सरलता' नामक गुणमें प्रतिष्ठित है, उसे ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन किया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध- संवादविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥

प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय

ब्राह्मण उवाच

पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत् ।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥ १ ॥
ब्राह्मणने पूछा— व्याध! शरीरमें रहनेवाला अग्निस্বরূপ प्राण पार्थिव धातुका अवलम्बन करके कैसे रहता है? और प्राणवायु नाड़ियोंके मार्गविशेषके द्वारा किस प्रकार (रस-रक्तादिका) संचालन करता है? ।। १ ।।

मार्कण्डेय उवाच

प्रश्नमेतं समुद्दिष्टं ब्राह्मणेन युधिष्ठिर ।
व्याधस्तु कथयामास ब्राह्मणाय महात्मने ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ब्राह्मणके द्वारा उपस्थित किये गये इस प्रश्नको सुनकर धर्मव्याधने उन महामना ब्राह्मणसे इस प्रकार कहा— ।। २ ।।

व्याध उवाच

मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालयन् ।
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥ ३ ॥
धर्मव्याध बोला— ब्रह्मन्! प्राणीके शरीरको सुरक्षित रखता हुआ अग्निस্বরূপ उदान वायु मस्तकका आश्रय लेकर शरीरमें रहता है एवं मुख्य प्राण मस्तक और उदानवायु—इन दोनोंमें स्थित हुआ समस्त शरीरमें जीवनका संचार करता है१। ।। ३ ।।

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं प्राणे प्रतिष्ठितम् ।
श्रेष्ठं तदेव भूतानां ब्रह्मयोनिमुपास्महे ॥ ४ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्य—सब कुछ प्राणके ही आश्रित है, वह प्राण ही समस्त भूतोंमें श्रेष्ठ है।२ अतः परब्रह्मसे उत्पन्न होनेवाले प्राणकी हम सब उपासना करते हैं३। ।। ४ ।।

स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः ।
महान् बुद्धिरहङ्कारो भूतानां विषयश्च सः ॥ ५ ॥
वह प्राण ही जीव है, वही समस्त प्राणियोंका आत्मा है, वही सनातन पुरुष है, महत्तत्त्व, बुद्धि और अहंकार तथा पाँचों भूतोंके कार्यरूप इन्द्रियाँ और उनके विषय सब

कुछ वही है (क्योंकि इस शरीरमें सबकी स्थिति उसीके आश्रित है और भविष्यमें मिलनेवाले शरीरमें जाना-आना भी इसीके आश्रित रहकर होता है। इसलिये यह प्राणकी स्तुति की गयी है)४ ।। ५ ।।
(अव्यक्तं सत्त्वसंज्ञं च जीवः कालः स चैव हि ।
प्रकृतिः पुरुषश्चैव प्राण एव द्विजोत्तम ।।
जागर्ति स्वप्नकाले च स्वप्ने स्वप्नायते च सः ।
द्विजश्रेष्ठ! प्राण ही अव्यक्त, सत्त्व, जीव, काल, प्रकृति और पुरुष है। वही जाग्रत्-अवस्थामें जागता है। वही स्वप्नकालमें स्वप्न-जगत्का निर्माण करके स्वप्नावस्थाकी सारी चेष्टाएँ करता है ।।
जाग्रत्सु बलमाधत्ते चेष्टत्सु चेष्टयत्यपि ।।
तस्मिन् निरुद्धे विप्रेन्द्र मृत इत्यभिधीयते ।
त्यक्त्वा शरीरं भूतात्मा पुनरन्यत् प्रपद्यते ।।)
वही जाग्रत्कालमें बलका आधान करता है और चेष्टाशील प्राणियोंमें चेष्टा उत्पन्न करता है। विप्रवर! उस प्राणका निरोध हो जानेपर ही प्रत्येक जीव मरा हुआ कहलाता है। भूतात्मा प्राण एक शरीरको छोड़कर फिर दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है ।।
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते ।
पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ।। ६ ।।
इस प्रकार इस जगत्में सर्वत्र प्राणकी स्थिति है। प्राणके द्वारा ही सबका पालन होता है। पीछे वही प्राण जब समानवायु भावको प्राप्त होता है तब अपनी-अपनी पृथक् गतिका आश्रय लेता है ।। ६ ।।
बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः ।
वहन् मूत्रं पुरीषं वाऽप्यपानः परिवर्तते ।। ७ ।।
समानवायुके रूपमें जठराग्निका आश्रय ले वह प्राण जब मूत्राशय और गुदामें स्थित होता है, उस समय मल और मूत्रका भार वहन करनेके कारण वह अपानवायुके नामसे विख्यात हो संचरण करता है ।। ७ ।।
प्रयत्ने कर्मणि बले स एष त्रिषु वर्तते ।
उदानमिति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ।। ८ ।।
वही प्राण जब प्रयत्न (काम करनेकी चेष्टा), कर्म (उत्क्षेपण और गमन आदि) तथा बल (बोझ उठानेकी शक्ति)—इन तीन विषयोंमें प्रवृत्त होता है, तब अध्यात्मवेत्ता मनुष्य उसे उदान कहते हैं ।। ८ ।।
संधौ संधौ संनिविष्टः सर्वेष्वपि तथानिलः ।
शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ।। ९ ।।

वही जब मनुष्य-शरीरके प्रत्येक संधिस्थलमें व्याप्त होकर रहता है, तब उसे व्यान कहते हैं ॥ ९ ॥

धातुष्वग्निस्तु विततः स तु वायुसमीरितः ।
रसान् धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन् परिधावति ॥ १० ॥
त्वचा आदि सब धातुओंमें जठरानल व्याप्त है। वह प्राण आदि वायुओंसे प्रेरित होकर अन्न आदि रसों, त्वचा आदि धातुओं तथा पित्त आदि दोषोंको परिपक्व करता हुआ समूचे शरीरमें दौड़ा करता है ॥ १० ॥

प्राणानां संनिपातात् तु संनिपातः प्रजायते ।
ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ॥ ११ ॥
प्राण आदि वायुओंके परस्पर मिलनेसे एक संघर्ष उत्पन्न होता है, उससे प्रकट होनेवाले उत्तापको ही जठरानल समझना चाहिये। वही देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाता है ॥ ११ ॥

समानोदानयोर्मध्ये प्राणापानौ समाहितौ ।
समर्थितस्त्वधिष्ठानं सम्यक् पचति पावकः ॥ १२ ॥
समान और उदान वायुओंके बीचमें प्राण और अपानवायुकी स्थिति है। उनके संघर्षसे उत्पन्न जठरानल अन्नको पचाता है और उसके रससे इस शरीरको भलीभाँति पुष्ट करता है* ॥ १२ ॥

अस्यापि पायूपर्यन्तस्तथा स्याद् गुदसंज्ञितः ।
स्रोतांसि तस्माज्जायन्ते सर्वप्राणेषु देहिनाम् ॥ १३ ॥
इस जठरानलका स्थान नाभिसे लेकर पायुतक है। इसीको 'गुदा' कहते हैं। उस गुदासे देहधारियोंके समस्त प्राणोंमें स्रोत (नाडीमार्ग) प्रकट होते हैं ॥ १३ ॥

अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते ।
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥ १४ ॥
गुदासे प्राण अग्निके वेगको लेकर गुदान्तमें टकराता है, फिर वहाँसे ऊपरको उठकर वह जठराग्निको भी ऊपर उठाता है ॥ १४ ॥

पक्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्ध्वमामाशयः स्थितः ।
नाभिमध्ये शरीरस्य प्राणाः सर्वे प्रतिष्ठिताः ॥ १५ ॥
नाभिके नीचे पक्वाशय (पके हुए भोजनका स्थान) है और ऊपर आमाशय (कच्चे भोजनका स्थान) है। शरीरमें स्थित समस्त प्राण नाभिमें ही प्रतिष्ठित हैं—वही उनका केन्द्रस्थान है ॥ १५ ॥

प्रवृत्ता हृदयात् सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ।
वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः ॥ १६ ॥

नाड़ियाँ हृदयसे नीचे-ऊपर और इधर-उधर फैली हुई हैं। वे दस प्राणवायुओंसे प्रेरित हो शरीरके सब भागोंमें अन्नके रसोंको पहुँचाती रहती हैं ।। १६ ।। योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत् परम् । जितक्लमाः समा धीरा मूर्ध्न्यात्मानमादधुः । एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु ।। १७ ।। जिन्होंने समस्त क्लेशोंको जीत लिया है, जो समदर्शी और धीर हैं, जिन्होंने (सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा) अपने प्राणमय आत्माको मस्तक (वर्ती सहस्रारचक्र)-में ले जाकर स्थापित किया है, उन योगियोंके लिये यह (मस्तकसे लेकर पायूतकका सुषुम्णामय) मार्ग है, जिससे वे उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार समस्त जीवात्माओंके शरीरोंमें ये प्राणवायु और अपानवायु व्याप्त हैं ।। १७ ।। (तावग्निसहितौ ब्रह्मन् विद्धि वै प्राणमात्मनि ।) एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः । मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं योगजितात्मकम् ।। १८ ।। ब्रह्मन्! वे प्राण और अपान जठरानलके साथ रहते हैं। प्राणको आत्मामें स्थित जानिये। आत्मा एकादश इन्द्रियरूप विकारोंसे युक्त, षोडश* कलाओंके समूहसे सम्पन्न, शरीरको धारण करनेवाला तथा नित्य है। उसने योगबलसे मन-बुद्धिको अपने अधीन कर रखा है। इस प्रकार आत्माके सम्बन्धमें आपको जानना चाहिये ।। १८ ।। तस्मिन् यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यं स्थाल्यामिवोहितः । आत्मानं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ।। १९ ।। जैसे बटलोईमें आग रखी गयी हो, उसी प्रकार पूर्वोक्त कला-समूहरूप शरीरमें प्रकाशस्वरूप आत्मा सदा विद्यमान रहता है। आप उसे जानिये। वह नित्य तथा योगशक्तिसे मन-बुद्धिको अपने अधीन रखनेवाला है ।। १९ ।। देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे । क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ।। २० ।। जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद निर्लिप्त होती है, उसी प्रकार ये आत्मदेव कलात्मक शरीरमें असंगभावसे स्थित हैं। वे ही क्षेत्रज्ञ हैं, आप उन्हें जानिये। वे योगसे अपने मन और बुद्धिपर अधिकार प्राप्त करनेवाले तथा नित्य हैं ।। २० ।। जीवात्मकानि जानीहि रजः सत्त्वं तमस्तथा । जीवमात्मगुणं विद्धि तथाऽऽत्मानं परात्मकम् ।। २१ ।। ब्रह्मन्! आप यह जान लें कि सत्त्वगुण (प्रकाश), रजोगुण (प्रवृत्ति) और तमोगुण (मोह)—ये जीवात्मक हैं; अर्थात् जीवात्माके अन्तःकरणके विकार हैं, जीव आत्माका गुण (सेवक) है और आत्मा परमात्मस्वरूप है। भाव यह कि परमात्माको ही यहाँ आत्मा कहा गया है ।। २१ ।।

अचेतनं जीवगुणं वदन्ति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति प्राकल्पयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २२ ॥ शरीर-तत्त्वके ज्ञाता महात्मा पुरुष जड शरीर आदिको जीवका भोग्य बताते हैं। वह जीव शरीरके भीतर रहकर स्वयं चेष्टाशील होता है तथा शरीर और इन्द्रिय आदि सबको चेष्टाओंमें लगाता है। जिन्होंने सातों भुवनोंका निर्माण किया है, उन परमात्माको ज्ञानी पुरुष जीवात्मासे उत्कृष्ट बताते हैं ॥ २२ ॥

एवं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मा सम्प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया ज्ञानवेदिभिः ॥ २३ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा परमेश्वर समस्त प्राणियोंके भीतर प्रकाशित हो रहे हैं। ज्ञानी महात्मा अपनी श्रेष्ठ एवं सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ २३ ॥

चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥ २४ ॥ मनुष्य अपने चित्तकी पवित्रताके द्वारा ही समस्त शुभाशुभ कर्मोंको नष्ट (फल देनेमें असमर्थ) कर देता है। जिसका अन्तःकरण प्रसन्न (पवित्र) है, वह अपने-आपमें ही स्थित होकर अक्षय सुख (मोक्ष)-का भागी होता है ॥ २४ ॥

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् । निवाते वा यथा दीपो दीप्येत् कुशलदीपितः ॥ २५ ॥ जैसे भोजन आदिसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे सोता है और जैसे वायुरहित स्थानमें चतुर मनुष्यके द्वारा जलाया हुआ दीप निश्चलभावसे प्रकाशित होता है; ऐसा ही लक्षण चित्तकी पवित्रताका भी है ॥ २५ ॥

पूर्वरात्रे परे चैव युञ्जानः सततं मनः । लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ २६ ॥ प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति । दृष्ट्वाऽऽत्मानं निरात्मानं स तदा विप्रमुच्यते ॥ २७ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह हलका भोजन करे और अन्तःकरणको शुद्ध रखे। रातके पहले और पिछले पहरमें सदा अपना मन परमात्माके चिन्तनमें लगावे। जो इस प्रकार निरन्तर अपने हृदयमें परमात्माके साक्षात्कारका अभ्यास करता है, वह प्रज्वलित दीपकके समान प्रकाशित होनेवाले अपने मनोमय प्रदीपके द्वारा निराकार परमेश्वरका साक्षात्कार करके तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ २६-२७ ॥

सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । एतत् पवित्रं लोकानां तपो वै संक्रमो मतः ॥ २८ ॥

सम्पूर्ण उपायोंसे लोभ और क्रोधकी वृत्तियोंको दबाना चाहिए। संसारमें यही पवित्र तप है और यही सबके लिये भवसागरसे पार उतारनेवाला सेतु माना गया है ।। २८ ।। नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेद् धर्मं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ।। २९ ।। सदा तपको क्रोधसे, धर्मको द्वेषसे, विद्याको मान-अपमानसे और अपने-आपको प्रमादसे बचाना चाहिये ।। २९ ।। आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं व्रतपरं व्रतम् ।। ३० ।। क्रूरताका अभाव (दया) सबसे महान् धर्म है, क्षमा सबसे बड़ा बल है, सत्य सबसे उत्तम व्रत है और परमात्माके तत्त्वका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है ।। ३० ।। सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यं ज्ञानं हितं भवेत् । यद् भूतहितमत्यन्तं तद् वै सत्यं परं मतम् ।। ३१ ।। सत्य बोलना सदा कल्याणकारी है। यथार्थ ज्ञान ही हितकारक होता है। जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो उसे ही उत्तम सत्य माना गया है ।। ३१ ।। यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धनाः सदा । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ।। ३२ ।। जिसके सम्पूर्ण आयोजन कभी कामनाओंसे बँधे हुए नहीं होते तथा जिसने त्यागकी आगमें अपना सर्वस्व होम दिया है वही त्यागी और बुद्धिमान् है ।। ३२ ।। यतो न गुरुरप्येनं श्रावयेदुपपादयेत् । तं विद्याद् ब्रह्मणो योगं वियोगं योगसंज्ञितम् ।। ३३ ।। इसलिये दृश्य संसारसे वियोग करानेवाले और योग नामसे कहे जानेवाले इस ब्रह्मयोगको स्वयं जानना और सम्पादन करना चाहिये। गुरुको भी उचित है कि वह इसे अपात्र शिष्यके प्रति न सुनावे ।। ३३ ।। न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् । नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ।। ३४ ।। किसी प्राणीकी हिंसा न करे। सबमें मित्रभाव रखते हुए विचरे। इस दुर्लभ मनुष्य-जीवनको पाकर किसीके साथ वैर न करे ।। ३४ ।। आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम् । एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम् ।। ३५ ।। कुछ भी संग्रह न रखना, सभी दशाओंमें अत्यन्त संतुष्ट रहना तथा कामना और लोलुपताको त्याग देना—यही परम ज्ञान है और यही सत्यस्वरूप उत्तम आत्मज्ञान है ।। ३५ ।। परिग्रहं परित्यज्य भवेद् बुद्ध्या यतव्रतः ।

अशोकं स्थानमाश्रित्य निश्चलं प्रेत्य चेह च ॥ ३६ ॥
इहलोक और परलोकके समस्त भोगोंका एवं सब प्रकारके संग्रहका त्याग करके शोकरहित निश्चल परमधामको लक्ष्य बनाकर बुद्धिके द्वारा मन और इन्द्रियोंका संयम करे ॥ ३६ ॥
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना ।
अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥ ३७ ॥
जो जितेन्द्रिय है, जिसने मनपर अधिकार प्राप्त कर लिया है तथा जो अजित पदको जीतनेकी इच्छा करता है, नित्य तपस्यामें संलग्न रहनेवाले उस मुनिको आसक्ति-जनक भोगोंसे अलग—अनासक्त रहना चाहिये ॥ ३७ ॥
गुणागुणमनासङ्गमकार्यमनन्तरम् ।
एतत् तद् ब्रह्मणो वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ॥ ३८ ॥
जो गुणमें रहता हुआ भी गुणोंसे रहित है, जो सर्वथा संगसे रहित है तथा जो एकमात्र अन्तरात्माके द्वारा ही साध्य है, जिसकी उपलब्धिमें अविद्याके सिवा और कोई व्यवधान नहीं है, वही ब्रह्मका अद्वितीय नित्य सिद्ध पद है और वही (निरतिशय) सुख है ॥ ३८ ॥
परित्यजति यो दुःखं सुखं चाप्युभयं नरः ।
ब्रह्म प्राप्नोति सोऽत्यन्तमसङ्गेन च गच्छति ॥ ३९ ॥
जो मनुष्य दुःख और सुख दोनोंको त्याग देता है, वही अनन्त ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। अनासक्तिके द्वारा भी उसी पदकी प्राप्ति होती है ॥ ३९ ॥
यथाश्रुतमिदं सर्वं समासेन द्विजोत्तम ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४० ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैंने यह सब जैसा सुना है, वैसा सब-का-सब थोड़ेमें आपसे कह सुनाया है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/३ श्लोक हैं)


१. देखिये प्रश्नोपनिषद् प्रश्न ३ मन्त्र ९।
२. देखिये प्रश्नोपनिषद् २।२, ३ और उसके आगेका प्रकरण।
३. देखिये प्रश्नोपनिषद् ३।३ तथा २।७।
४. प्राणकी स्तुतिका वर्णन अथर्ववेदमें और प्रश्नोपनिषद्में बहुत आया है।

*– तात्पर्य यह है कि हृदयमें रहनेवाला प्राण, नाभिमें रहनेवाले समानसे जाकर मिलता है। इसी तरह गुदामें रहनेवाला अपान कंठवर्ती उदानसे जा मिलता है, इस दशामें प्राण, अपान और समानका नाभिमें संघर्ष होनेसे जो अग्नि उत्पन्न होती है, उसे ही ‘जठरानल’ नाम दिया गया है। वही इस शरीरमें अन्नको पचाकर उसके रससे शरीरको पुष्ट करता है।
*– प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम—ये सोलह कलाएँ हैं (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! धर्मव्याधने जब इस प्रकार पूर्णरूपसे मोक्ष-धर्मका वर्णन किया, तब कौशिक ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे यों बोला ॥

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चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन

मार्कण्डेय उवाच

एवं संकथिते कृत्स्ने मोक्षधर्मे युधिष्ठिर ।
दृढप्रीतमना विप्रो धर्मव्याधमुवाच ह ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! धर्मव्याधने जब इस प्रकार पूर्णरूपसे मोक्ष-धर्मका वर्णन किया, तब कौशिक ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे यों बोला ॥ १ ॥

न्याययुक्तमिदं सर्वं भवता परिकीर्तितम् ।
न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् धर्मेष्विह हि दृश्यते ॥ २ ॥
‘तात! तुमने मुझसे जो कुछ कहा, यह सब न्याययुक्त है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ धर्मके विषयमें कोई ऐसी बात नहीं दिखायी देती जो तुम्हें ज्ञात न हो’ ॥ २ ॥

व्याध उवाच

प्रत्यक्षं मम यो धर्मस्तं च पश्य द्विजोत्तम ।
येन सिद्धिरियं प्राप्ता मया ब्राह्मणपुङ्गव ॥ ३ ॥
धर्मव्याधने कहा— विप्रवर! अब मेरा जो प्रत्यक्ष धर्म है, जिसके प्रभावसे मुझे यह सिद्धि प्राप्त हुई है, ब्राह्मणश्रेष्ठ! उसका भी दर्शन कर लीजिये ॥ ३ ॥

उत्तिष्ठ भगवन् क्षिप्रं प्रविश्याभ्यन्तरं गृहम् ।
द्रष्टुमर्हसि धर्मज्ञ मातरं पितरं च मे ॥ ४ ॥
भगवन्! आप धर्मके ज्ञाता हैं, उठिये और शीघ्र घरके भीतर चलकर मेरे माता-पिताका दर्शन कीजिये ॥ ४ ॥

मार्कण्डेय उवाच

इत्युक्तः स प्रविश्याथ ददर्श परमार्चितम् ।
सौधं हृद्यं चतुःशालमतीव च मनोरमम् ॥ ५ ॥
देवतागृहसंकाशं दैवतैश्च सुपूजितम् ।
शयनासनसम्बाधं गन्धैश्च परमैर्युतम् ॥ ६ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— धर्मव्याधके ऐसा कहनेपर कौशिक ब्राह्मणने भीतर प्रवेश करके देखा—एक बहुत सुन्दर साफ-सुथरा घर था, उसकी दीवारोंपर चूनेसे सफेदी की हुई थी। उसमें चार कमरे थे, वह भवन बहुत प्रिय और मनको लुभा लेनेवाला था, ऐसा जान पड़ता था, मानो देवताओंका निवासस्थान हो। देवता भी उसका आदर करते थे। एक ओर