भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1481

सम्पूर्ण उपायोंसे लोभ और क्रोधकी वृत्तियोंको दबाना चाहिए। संसारमें यही पवित्र तप है और यही सबके लिये भवसागरसे पार उतारनेवाला सेतु माना गया है ।। २८ ।। नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेद् धर्मं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ।। २९ ।। सदा तपको क्रोधसे, धर्मको द्वेषसे, विद्याको मान-अपमानसे और अपने-आपको प्रमादसे बचाना चाहिये ।। २९ ।। आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं व्रतपरं व्रतम् ।। ३० ।। क्रूरताका अभाव (दया) सबसे महान् धर्म है, क्षमा सबसे बड़ा बल है, सत्य सबसे उत्तम व्रत है और परमात्माके तत्त्वका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है ।। ३० ।। सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यं ज्ञानं हितं भवेत् । यद् भूतहितमत्यन्तं तद् वै सत्यं परं मतम् ।। ३१ ।। सत्य बोलना सदा कल्याणकारी है। यथार्थ ज्ञान ही हितकारक होता है। जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो उसे ही उत्तम सत्य माना गया है ।। ३१ ।। यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धनाः सदा । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ।। ३२ ।। जिसके सम्पूर्ण आयोजन कभी कामनाओंसे बँधे हुए नहीं होते तथा जिसने त्यागकी आगमें अपना सर्वस्व होम दिया है वही त्यागी और बुद्धिमान् है ।। ३२ ।। यतो न गुरुरप्येनं श्रावयेदुपपादयेत् । तं विद्याद् ब्रह्मणो योगं वियोगं योगसंज्ञितम् ।। ३३ ।। इसलिये दृश्य संसारसे वियोग करानेवाले और योग नामसे कहे जानेवाले इस ब्रह्मयोगको स्वयं जानना और सम्पादन करना चाहिये। गुरुको भी उचित है कि वह इसे अपात्र शिष्यके प्रति न सुनावे ।। ३३ ।। न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् । नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ।। ३४ ।। किसी प्राणीकी हिंसा न करे। सबमें मित्रभाव रखते हुए विचरे। इस दुर्लभ मनुष्य-जीवनको पाकर किसीके साथ वैर न करे ।। ३४ ।। आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम् । एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम् ।। ३५ ।। कुछ भी संग्रह न रखना, सभी दशाओंमें अत्यन्त संतुष्ट रहना तथा कामना और लोलुपताको त्याग देना—यही परम ज्ञान है और यही सत्यस्वरूप उत्तम आत्मज्ञान है ।। ३५ ।। परिग्रहं परित्यज्य भवेद् बुद्ध्या यतव्रतः ।