महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअचेतनं जीवगुणं वदन्ति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति प्राकल्पयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २२ ॥ शरीर-तत्त्वके ज्ञाता महात्मा पुरुष जड शरीर आदिको जीवका भोग्य बताते हैं। वह जीव शरीरके भीतर रहकर स्वयं चेष्टाशील होता है तथा शरीर और इन्द्रिय आदि सबको चेष्टाओंमें लगाता है। जिन्होंने सातों भुवनोंका निर्माण किया है, उन परमात्माको ज्ञानी पुरुष जीवात्मासे उत्कृष्ट बताते हैं ॥ २२ ॥
एवं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मा सम्प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया ज्ञानवेदिभिः ॥ २३ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा परमेश्वर समस्त प्राणियोंके भीतर प्रकाशित हो रहे हैं। ज्ञानी महात्मा अपनी श्रेष्ठ एवं सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ २३ ॥
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥ २४ ॥ मनुष्य अपने चित्तकी पवित्रताके द्वारा ही समस्त शुभाशुभ कर्मोंको नष्ट (फल देनेमें असमर्थ) कर देता है। जिसका अन्तःकरण प्रसन्न (पवित्र) है, वह अपने-आपमें ही स्थित होकर अक्षय सुख (मोक्ष)-का भागी होता है ॥ २४ ॥
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् । निवाते वा यथा दीपो दीप्येत् कुशलदीपितः ॥ २५ ॥ जैसे भोजन आदिसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे सोता है और जैसे वायुरहित स्थानमें चतुर मनुष्यके द्वारा जलाया हुआ दीप निश्चलभावसे प्रकाशित होता है; ऐसा ही लक्षण चित्तकी पवित्रताका भी है ॥ २५ ॥
पूर्वरात्रे परे चैव युञ्जानः सततं मनः । लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ २६ ॥ प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति । दृष्ट्वाऽऽत्मानं निरात्मानं स तदा विप्रमुच्यते ॥ २७ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह हलका भोजन करे और अन्तःकरणको शुद्ध रखे। रातके पहले और पिछले पहरमें सदा अपना मन परमात्माके चिन्तनमें लगावे। जो इस प्रकार निरन्तर अपने हृदयमें परमात्माके साक्षात्कारका अभ्यास करता है, वह प्रज्वलित दीपकके समान प्रकाशित होनेवाले अपने मनोमय प्रदीपके द्वारा निराकार परमेश्वरका साक्षात्कार करके तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ २६-२७ ॥
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । एतत् पवित्रं लोकानां तपो वै संक्रमो मतः ॥ २८ ॥