भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1479

नाड़ियाँ हृदयसे नीचे-ऊपर और इधर-उधर फैली हुई हैं। वे दस प्राणवायुओंसे प्रेरित हो शरीरके सब भागोंमें अन्नके रसोंको पहुँचाती रहती हैं ।। १६ ।। योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत् परम् । जितक्लमाः समा धीरा मूर्ध्न्यात्मानमादधुः । एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु ।। १७ ।। जिन्होंने समस्त क्लेशोंको जीत लिया है, जो समदर्शी और धीर हैं, जिन्होंने (सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा) अपने प्राणमय आत्माको मस्तक (वर्ती सहस्रारचक्र)-में ले जाकर स्थापित किया है, उन योगियोंके लिये यह (मस्तकसे लेकर पायूतकका सुषुम्णामय) मार्ग है, जिससे वे उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार समस्त जीवात्माओंके शरीरोंमें ये प्राणवायु और अपानवायु व्याप्त हैं ।। १७ ।। (तावग्निसहितौ ब्रह्मन् विद्धि वै प्राणमात्मनि ।) एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः । मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं योगजितात्मकम् ।। १८ ।। ब्रह्मन्! वे प्राण और अपान जठरानलके साथ रहते हैं। प्राणको आत्मामें स्थित जानिये। आत्मा एकादश इन्द्रियरूप विकारोंसे युक्त, षोडश* कलाओंके समूहसे सम्पन्न, शरीरको धारण करनेवाला तथा नित्य है। उसने योगबलसे मन-बुद्धिको अपने अधीन कर रखा है। इस प्रकार आत्माके सम्बन्धमें आपको जानना चाहिये ।। १८ ।। तस्मिन् यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यं स्थाल्यामिवोहितः । आत्मानं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ।। १९ ।। जैसे बटलोईमें आग रखी गयी हो, उसी प्रकार पूर्वोक्त कला-समूहरूप शरीरमें प्रकाशस्वरूप आत्मा सदा विद्यमान रहता है। आप उसे जानिये। वह नित्य तथा योगशक्तिसे मन-बुद्धिको अपने अधीन रखनेवाला है ।। १९ ।। देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे । क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ।। २० ।। जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद निर्लिप्त होती है, उसी प्रकार ये आत्मदेव कलात्मक शरीरमें असंगभावसे स्थित हैं। वे ही क्षेत्रज्ञ हैं, आप उन्हें जानिये। वे योगसे अपने मन और बुद्धिपर अधिकार प्राप्त करनेवाले तथा नित्य हैं ।। २० ।। जीवात्मकानि जानीहि रजः सत्त्वं तमस्तथा । जीवमात्मगुणं विद्धि तथाऽऽत्मानं परात्मकम् ।। २१ ।। ब्रह्मन्! आप यह जान लें कि सत्त्वगुण (प्रकाश), रजोगुण (प्रवृत्ति) और तमोगुण (मोह)—ये जीवात्मक हैं; अर्थात् जीवात्माके अन्तःकरणके विकार हैं, जीव आत्माका गुण (सेवक) है और आत्मा परमात्मस्वरूप है। भाव यह कि परमात्माको ही यहाँ आत्मा कहा गया है ।। २१ ।।