महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1470, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति । परावरज्ञो यः शक्तः स तु भूतानि पश्यति ॥ १४ ॥ वह सम्पूर्ण लोकोंमें अपनेको व्याप्त और अपनेमें सम्पूर्ण लोकोंको स्थित देखता है। इस प्रकार जो निर्गुण ब्रह्मको जाननेवाला समर्थ ज्ञानी पुरुष है, वह सम्पूर्ण भूतोंको आत्मरूपसे देखता है ॥ १४ ॥
पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा । ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते ॥ १५ ॥ सब अवस्थाओंमें सदा समस्त भूतोंको आत्मरूपसे देखनेवाले उस ब्रह्मस्वरूप ज्ञानीका कभी भी अशुभ कर्मोंसे सम्पर्क होना सम्भव नहीं है ॥ १५ ॥
अज्ञानमूलं तं क्लेशमतिवृत्तस्य पौरुषम् । लोकवृत्तिप्रकाशेन ज्ञानमार्गेण गम्यते ॥ १६ ॥ उस (पूर्वोक्त) अज्ञानजनित क्लेशसे जो पार हो गया है, उस महापुरुषका प्रभाव उसके द्वारा की जानेवाली लौकिक चेष्टाओंसे ज्ञानमार्गके द्वारा जाना जा सकता है ॥ १६ ॥
अनादिनिधनं जन्तुमात्मयोनिं सदाव्ययम् । अनौपम्यममूर्तं च भगवानाह बुद्धिमान् ॥ १७ ॥ बुद्धिमान् भगवान् ब्रह्माने (अपने निःश्वासभूत वेदोंके द्वारा) मुक्त जीवको आदि-अन्तसे रहित, स्वयम्भू, अविकारी, अनुपम तथा निराकार बताया है ॥ १७ ॥
तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां विप्रानुपृच्छसि । इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥ १८ ॥ विप्रवर! आप मुझसे जो कुछ पूछते हैं, उसके उत्तरमें मैं यह बता रहा हूँ कि इस सबका मूल तप है। इन्द्रियोंका संयम करनेसे ही वह तपस्या सम्पन्न होती है, और किसी प्रकारसे नहीं ॥ १८ ॥
इन्द्रियाण्येव तत् सर्वं यत् स्वर्गनरकावुभौ । निगृहीतविसृष्टानि स्वर्गाय नरकाय च ॥ १९ ॥ स्वर्ग और नरक आदि जो कुछ भी है, वह सब इन्द्रियाँ ही हैं, अर्थात् इन्द्रियाँ ही उनकी कारण हैं। वशमें की हुई इन्द्रियाँ स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाली हैं और जिन्हें विषयोंकी ओर खुला छोड़ दिया गया है, वे इन्द्रियाँ नरकमें डालनेवाली हैं ॥ १९ ॥
एष योगविधिः कृत्स्नो यावदिन्द्रियधारणम् । एतन्मूलं हि तपसः कृत्स्नस्य नरकस्य च ॥ २० ॥ योगका सम्पूर्णरूपसे अनुष्ठान यही है कि मनसहित समस्त इन्द्रियोंको काबूमें रखा जाय। यही सारी तपस्याका मूल है, और इन्द्रियोंको वशमें न रखना ही नरकका हेतु है ॥
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमार्च्छन्त्यसंशयम् । संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं समाप्नुयात् ॥ २१ ॥