महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1471, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रियोंके संसर्गसे ही मनुष्य निःसंदेह दुर्गुण-दुराचार आदि दोषोंको प्राप्त होते हैं। उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी तरह वशमें कर लेनेपर उन्हें सर्वथा सिद्धि प्राप्त हो सकती है॥ २१॥
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति ।
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥ २२ ॥
जो अपने शरीरमें ही सदा विद्यमान रहनेवाले मनसहित छहों इन्द्रियोंपर अधिकार पा लेता है वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंमें नहीं लगता। फिर पापजनित अनर्थोंसे तो उसका संयोग ही कैसे हो सकता है? ।।
रथः शरीरं पुरुषस्य दृष्ट-
मात्मा नियन्तेन्द्रियाण्याहुरश्वान् ।
तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै-
र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥ २३ ॥
पुरुषका यह प्रत्यक्ष देखनेमें आनेवाला स्थूल शरीर रथ है। आत्मा (बुद्धि) सारथि है और इन्द्रियोंको अश्व बताया गया है। जैसे कुशल, सावधान एवं धीर रथी उत्तम घोड़ोंको अपने वशमें रखकर उनके द्वारा सुखपूर्वक मार्ग तै करता है, उसी प्रकार सावधान, धीर एवं साधन-कुशल पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करके सुखसे जीवन-यात्रा पूर्ण करता है॥ २३॥
षण्णामात्मनि युक्तानामिन्द्रियाणां प्रमाथिनाम् ।
यो धीरो धारयेद् रश्मीन् स स्यात् परमसारथिः ॥ २४ ॥
जो धीर पुरुष अपने शरीरमें नित्य विद्यमान छः प्रमथनशील इन्द्रियरूपी अश्वोंकी बागडोर सँभालता है, वही उत्तम सारथि हो सकता है॥ २४॥
इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु ।
धृतिं कुर्वीत सारथ्ये धृत्या तानि जयेद् ध्रुवम् ॥ २५ ॥
सड़कपर दौड़नेवाले घोड़ोंकी तरह विषयोंमें विचरनेवाली इन इन्द्रियोंको वशमें करनेके लिये धैर्यपूर्वक प्रयत्न करे। धैर्यपूर्वक उद्योग करनेवालेको उनपर अवश्य विजय प्राप्त होती है॥ २५॥
इन्द्रियाणां विचरतां यन्मनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरते बुद्धिं नावं वायुरिवाम्भसि ॥ २६ ॥
जैसे जलमें चलनेवाली नावको वायु हर लेती है, वैसे ही विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे मन जिस इन्द्रियके साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुषकी बुद्धिको हर लेती है॥ २६॥
येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात् फलागमम् ।
तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ॥ २७ ॥