भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1492, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1492

**धर्मव्याधने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! उस पतिव्रता देवीने पहले आपसे मेरे विषयमें जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि उसने पातिव्रत्यके प्रभावसे सब कुछ प्रत्यक्ष देखा है॥ ५॥ त्वदनुग्रहबुद्ध्या तु विप्रैतद् दर्शितं मया। वाक्यं च शृणु मे तात यत् ते वक्ष्ये हितं द्विज॥ ६॥ विप्रवर! आपपर अनुग्रह करनेके विचारसे ही मैंने ये सब बातें आपके सामने रखी हैं। तात! आप मेरी बात सुनिये। ब्रह्मन्! आपके लिये जो हितकर है वही बात बताऊँगा॥ ६॥ त्वया विनिकृता माता पिता च द्विजसत्तम। अनिसृष्टोऽसि निष्क्रान्तो गृहात् ताभ्यामनिन्दित॥ ७॥ वेदोच्चारणकार्यार्थमयुक्तं तत् त्वया कृतम्। तव शोकेन वृद्धौ तावन्धीभूतौ तपस्विनौ॥ ८॥ द्विजश्रेष्ठ! आपने माता-पिताकी उपेक्षा की है। वेदाध्ययन करनेके लिये उन दोनोंकी आज्ञा लिये बिना ही आप घरसे निकल पड़े हैं। अनिन्द्य ब्राह्मण! यह आपके द्वारा अनुचित कार्य हुआ है। आपके शोकसे ये दोनों बूढ़े एवं तपस्वी माता-पिता अन्धे हो गये हैं॥ तौ प्रसादयितुं गच्छ मा त्वां धर्मोऽत्यगादयम्। तपस्वी त्वं महात्मा च धर्मे च निरतः सदा॥ ९॥ आप उन्हें प्रसन्न करनेके लिये घर जाइये। ऐसा करनेसे आपका धर्म नष्ट नहीं होगा। आप तपस्वी, महात्मा तथा निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं॥ ९॥ सर्वमेतदपार्थं ते क्षिप्रं तौ सम्प्रसादय। श्रद्धध्व मम ब्रह्मन् नान्यथा कर्तुमर्हसि। गम्यतामद्य विप्रर्षे श्रेयस्ते कथयाम्यहम्॥ १०॥ परंतु माता-पिताको संतुष्ट न करनेके कारण आपका यह सारा धर्म और व्रत व्यर्थ हो गया है। अतः शीघ्र जाकर उन दोनोंको प्रसन्न कीजिये। ब्रह्मन्! मेरी बातपर श्रद्धा कीजिये। इसके विपरीत कुछ न कीजिये। ब्रह्मर्षे! आप अपने घर जाइये और माता-पिताकी सेवा कीजिये। यह मैं आपके लिये परम कल्याणकी बात बता रहा हूँ॥ १०॥

ब्राह्मण उवाच

यदेतदुक्तं भवता सर्वं सत्यमसंशयम्। प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते धर्माचारगुणान्वित॥ ११॥ **ब्राह्मण बोला—**धर्म, सदाचार और सद्गुणोंसे सम्पन्न व्याध! आपका भला हो। आपने यह जो कुछ बताया है, सब निःसंदेह सत्य है। मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ ११॥

व्याध उवाच

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